घर के नौकर ने कर दिया करनामा/पति की एक गलती की वजह से पत्नी के साथ हुआ कां@ड/
पति की खौफनाक गलती और नौकर की हवस: केसर देसर का दोहरा कत्ल
अध्याय १: बीकानेर का रुतबा और बाँझपन का दंश
राजस्थान का बीकानेर जिला अपने थार रेगिस्तान की तपती रेत, ऐतिहासिक हवेलियों और कड़क मिजाज परंपराओं के लिए जाना जाता है। इसी जिले की एक तहसील के अंतर्गत आता है एक समृद्ध और शांत गाँव—’केसर देसर’।
केसर देसर गाँव में चारों तरफ पीले गेहूँ और सरसों के लहलहाते खेत थे। गाँव के मुहाने पर बनी एक विशाल, लाल पत्थरों वाली दोमंजिला हवेली दूर से ही नजर आती थी। यह हवेली थी ५५ वर्षीय नागेश कुमार की। नागेश कुमार के पास २६ एकड़ उपजाऊ सिंचित जमीन थी। गाँव में उनका पैसा, रुतबा, हुकूमत और मान-मर्यादा सब कुछ चरम पर था। नागेश गाँव के गरीब-गुरबों की समय-समय पर आर्थिक मदद किया करते थे, जिसके चलते पूरा गाँव उन्हें ‘साहब जी’ कहकर पुकारता था और उनकी बात को पत्थर की लकीर मानता था।
नागेश कुमार के परिवार में कोई लंबा-चौड़ा कुनबा नहीं था। उनकी पत्नी का देहांत वर्षों पहले हो चुका था। उनके जीवन का एकमात्र सहारा और चिराग था उनका २४ वर्षीय इकलौता बेटा—तरुण।
तरुण दिखने में सीधा-साधा, मेहनती और पिता के नक्शेकदम पर चलने वाला नौजवान था। उसने शहर जाकर उच्च शिक्षा पाने की जगह गाँव में ही रहकर पिता की २६ एकड़ जमीन का कामकाज सँभालना बेहतर समझा था। वह भोर की पहली किरण के साथ ट्रैक्टर लेकर खेतों में निकल जाता और देर रात तक पसीना बहाकर फसलों की देखभाल करता। तरुण की मेहनत की बदौलत ही नागेश कुमार की तिजोरी हमेशा रुपयों से भरी रहती थी।
आज से ठीक आठ साल पहले, नागेश कुमार ने बड़ी धूमधाम से तरुण का विवाह पास के गाँव की एक बेहद सुंदर, सुशील और संस्कारी कन्या ‘संजना’ के साथ कराया था। संजना जब बहू बनकर केसर देसर की हवेली में आई, तो गाँव की औरतों ने यही कहा कि नागेश कुमार के घर साक्षात लक्ष्मी पधारी हैं। संजना का चेहरा ऐसा था मानो संगमरमर पर तराशा गया हो—गोरा रंग, बड़ी-बड़ी कजरारी आँखें और शालीन स्वभाव।
शुरुआती दो-तीन साल तो तरुण और संजना का दांपत्य जीवन बहुत ही प्रेम और मिठास के साथ बीता। दोनों एक-दूसरे पर जान छिड़कते थे। लेकिन जैसे-जैसे शादी के साल बीतते गए, घर की दीवारों पर एक अनजाना सन्नाटा और उदासी रेंगने लगी।
शादी के आठ साल बीत चुके थे, लेकिन संजना की गोद खाली थी। घर के आँगन में किसी नन्हे-मुन्ने बच्चे की किलकारी नहीं गूँजी थी।
गाँव-देहात में अगर शादी के दो-तीन साल बाद बच्चा न हो, तो दुनिया भर की तानशाही बातें शुरू हो जाती हैं। लेकिन सबसे बड़ा दंश और मानसिक प्रताड़ना घर के अंदर से ही आ रही थी। नागेश कुमार का पूरा ध्यान केवल इस बात पर टिका हुआ था कि उनकी इतनी बड़ी जायदाद, २६ एकड़ ज़मीन और हवेली का वारिस कौन बनेगा।
नागेश कुमार जब भी खाना खाने बैठते या शाम को आँगन में हुक्का गुड़गुड़ाते, तो तरुण को अपने पास बुलाते और भारी आवाज में कहते, “तरुण! मेरी बात ध्यान से सुन। यह धन-दौलत, यह हवेली, यह २६ एकड़ जमीन सब मिट्टी हो जाएगी अगर इस घर को सँभालने वाला कोई चिराग नहीं हुआ। मुझे अपने जीते-जी इस घर का वारिस चाहिए। अगर इस वंश की बेल आगे नहीं बढ़ी, तो मैं गाँव वालों को क्या मुँह दिखाऊँगा?”
तरुण अपने पिता की इन बातों को सुनकर अंदर ही अंदर घुटता रहता। वह अपने पिता के हाथ जोड़कर नम्रता से कहता, “पिताजी, आप शांत रहिए। हम दोनों (मैं और संजना) पूरी कोशिश कर रहे हैं। डॉक्टरों को भी दिखाया है, पूजा-पाठ भी कराया है। लेकिन औलाद देना या न देना इंसान के वश में नहीं है, यह तो ईश्वर की इच्छा पर निर्भर करता है। जिस दिन भगवान की कृपा होगी, उस दिन आपके हाथ में आपका पोता आ जाएगा।”
“ईश्वर की इच्छा के भरोसे कब तक बैठा रहूँ?” नागेश गरज उठते, “आठ साल कम नहीं होते! गाँव के लोग अब मुझसे दबी ज़बान में पूछने लगे हैं कि नागेश जी, आपकी ज़मीन का वारिस कौन है? मुझे वारिस चाहिए तरुण, किसी भी कीमत पर!”
बात केवल बाप-बेटे तक सीमित नहीं रहती थी। जब नागेश कुमार तरुण को डांटकर चले जाते, तो तरुण उस गुस्से और हताशा को अपनी बेकसूर पत्नी संजना पर निकालता।
“तुम्हारी वजह से आज मुझे पिताजी की गालियाँ सुननी पड़ रही हैं!” तरुण बंद कमरे में संजना पर चिल्लाता, “गाँव भर में मेरी थू-थू हो रही है! औरत होकर भी तुम मुझे एक बच्चा नहीं दे सकतीं!”
संजना अपनी साड़ी के पल्लू से मुँह ढककर सिसक-सिसक कर रोने लगती। वह तड़पकर कहती, “इसमें मेरा क्या कसूर है तरुण जी? मैंने कौन सी देवी-देवता की मन्नत नहीं माँगी? कौन से मज़ार पर माथा नहीं टेका? कौन सा डॉक्टर नहीं देखा? अगर ऊपर वाले ने मेरी कोख में औलाद नहीं लिखी, तो इसमें मेरी क्या गलती?”
इस तरह केसर देसर की उस आलीशान हवेली में कोई भी ऐसा दिन नहीं गुजरता था, जिस दिन बच्चे और वारिस के नाम पर क्लेश, चीख-पुकार और आँसू न बहे हों।
अध्याय २: गुप्त कड़वा सच और पंचायत की ज़िल्लत
वक्त अपनी रफ्तार से सरकता रहा। ५ जनवरी २०२६ की सुबह का समय था। शीतकाल की कड़ाके की धूप बीकानेर की रेतीली जमीनों पर बिखर रही थी। सुबह के लगभग ८:०० बजे का समय रहा होगा।
संजना अपने घर में बिल्कुल अकेली थी। उसके ससुर नागेश कुमार किसी काम से तहसील गए हुए थे और पति तरुण भी घर पर नहीं था। संजना रसोईघर में चूल्हे की राख साफ कर रही थी कि तभी हवेली के मुख्य लकड़ी के बड़े दरवाजे पर जोर-जोर से दस्तक हुई।
संजना ने अपने सिर पर पल्लू ठीक किया और जाकर दरवाजा खोला।
दरवाजे पर गाँव का ही एक २५ वर्षीय युवक ‘शंकर’ खड़ा था। शंकर गाँव का एक आवारा, लफंगा और बदचलन किस्म का लड़का था। गाँव में उसकी पहचान एक ऐसे इंसान के रूप में थी जो लंगोट का बेहद कच्चा था और हमेशा महिलाओं पर नीच नजरें गड़ाए रखता था।
जैसे ही संजना ने दरवाजा खोला, शंकर की आँखें संजना की खूबसूरती पर जाकर टिक गईं। संजना के सादे, घरेलू लिबास और उसकी ढलती उम्र की निखरी कांति को देखकर शंकर मन ही मन जीभ लपलपाने लगा। वह संजना को ऊपर से नीचे तक भूखी नजरों से निहारने लगा।
संजना को शंकर की वह दृष्टि बेहद असहज लगी। उसने संजीदा लहजे में पूछा, “क्या काम है शंकर?”
शंकर ने अपनी मूँछों पर हाथ फेरते हुए एक कुटिल मुस्कान के साथ कहा, “राम-राम भाभी जी! मेरा यार तरुण कहाँ है? आजकल दिखता नहीं, तो सोचा घर आकर ही हाल-चाल पूछ लूँ।”
संजना ने बिना उसकी तरफ देखे रुखाई से जवाब दिया, “वह बाहर गए हैं, अभी आते ही होंगे।”
“चलो, जब तक तरुण आता है, तब तक मैं अंदर बैठकर इंतजार कर लेता हूँ,” शंकर बिना इजाजत लिए बेशर्मी से चौखट लाँघकर आँगन की खाट पर बैठ गया। संजना नाखुश होकर रसोई में चली गई।
पाँच-सात मिनट के भीतर ही तरुण बाहर से लौट आया। अपने दोस्त शंकर को खाट पर बैठा देखकर तरुण का चेहरा थोड़ा खिला। दोनों ने एक-दूसरे का हाल-चाल पूछा।
तरुण ने कहा, “शंकर, यहाँ घर में बातें करना ठीक नहीं। चल, खेतों की तरफ चलते हैं, वहाँ शांति से बैठकर बात करेंगे।”
तरुण अपनी मोटरसाइकिल निकालता है और शंकर को पीछे बैठाकर अपने खेतों की ओर निकल पड़ता है। खेत के किनारे बने नलकूप के छप्पर के नीचे दोनों दोस्त बैठ जाते हैं। सर्दी की धूप में तरुण के चेहरे पर उदासी की काली परत छाई हुई थी।
शंकर ने जेब से बीड़ी निकाली, सुलगाई और तरुण की तरफ बढ़ाते हुए पूछा, “क्या बात है तरुण? आज तेरा चेहरा उतरा हुआ क्यों है? किसी बात की चिंता है क्या?”
तरुण ने एक गहरा कश खींचा और धुएँ का गुबार छोड़ते हुए भर्राई आवाज में बोला, “क्या बताऊँ शंकर… मैं अंदर से पूरी तरह टूट चुका हूँ। मेरे पिताजी (नागेश) दिन-रात मुझे ताने मारते रहते हैं। उन्हें हर हाल में वारिस चाहिए। हर रोज घर में बच्चे को लेकर झगड़ा होता है। पिताजी कहते हैं कि संजना बांझ है और उसकी वजह से हमारा वंश डूब रहा है।”
शंकर ने सहानुभूति जताते हुए कहा, “तो भाई, इसमें इतना परेशान होने की क्या बात है? आज के जमाने में विज्ञान इतना आगे बढ़ चुका है। तू संजना को बीकानेर के किसी बड़े अस्पताल ले जा, किसी बड़े डॉक्टर से दोनों का मेडिकल चेकअप करवा। हो सकता है कोई छोटी-मोटी कमी हो जो दवाई से ठीक हो जाए।”
शंकर की यह बात सुनते ही तरुण की आँखों में अचानक खौफ और बेबसी के आँसू छलक आए। तरुण ने अपने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लिया और फफक-फफक कर रोने लगा।
शंकर चौंक गया, “अरे तरुण! क्या हुआ भाई? रो क्यों रहा है?”
तरुण ने अपना मुँह पोछा और काँपती आवाज में वह कड़वा सच उगला जिसे उसने अब तक अपने सीने में दफन कर रखा था।
“शंकर… तू मेरा पक्का दोस्त है, इसलिए तुझसे कुछ नहीं छिपाऊँगा। लेकिन कसम खा कि यह बात मेरे घर वालों या गाँव में किसी के कान तक नहीं पहुँचेगी।”
“तेरी कसम भाई! बात मेरे पेट में ही दफन रहेगी। बता क्या बात है?”
तरुण ने गिड़गिड़ाते हुए कहा, “पिछले ही हफ्ते मैं बीकानेर के सबसे बड़े गुप्त रोग और संतानहीनता विशेषज्ञ डॉक्टर के पास अकेले गया था। डॉक्टर ने मेरा पूरा मेडिकल चेकअप किया, कई तरह की पैथोलॉजी रिपोर्ट निकालीं। और अंत में डॉक्टर ने जो रिपोर्ट मुझे दी, उसने मेरी जिंदगी तबाह कर दी…”
“क्या कहा डॉक्टर ने?” शंकर ने उत्सुकता से पूछा।
“डॉक्टर ने साफ-साफ कह दिया कि संजना में कोई कमी नहीं है! कमी मेरे अंदर है! मेरे शुक्राणु (sperm count) पूरी तरह शून्य हैं। डॉक्टर ने ठोक बजाकर कह दिया कि ‘तरुण, तुम जीवन में कभी भी बाप नहीं बन सकते! तुम एक नामर्द हो!’ यह सुनकर मेरे पैरों तले से जमीन खिसक गई शंकर! लेकिन यह बात मैंने आज तक न अपने पिता को बताई है और न अपनी पत्नी संजना को। अगर पिताजी को पता चल गया कि उनका इकलौता बेटा नामर्द है, तो वह मुझे जिंदा गाड़ देंगे! और अगर संजना को पता चला, तो वह मुझे छोड़कर चली जाएगी!”
जब तरुण यह भयानक सच अपने दोस्त शंकर को बता रहा था, ठीक उसी समय खेत की पगडंडी से होती हुई गाँव की एक कुख्यात विधवा महिला ‘कल्याणी देवी’ वहाँ पहुँच गई।
कल्याणी देवी उम्र के ३०वें पड़ाव पर थी। ३ साल पहले उसके पति की मौत हो चुकी थी। कल्याणी का चरित्र गाँव में अत्यंत संदिग्ध और बदचलन माना जाता था। वह केवल पैसों के लालच में अमीर पुरुषों को अपनी ख़ूबसूरती के जाल में फँसाती थी और उनसे पैसे ऐंठती थी।
कल्याणी की नजर जैसे ही खाट पर बैठे समृद्ध ज़मींदार के बेटे तरुण पर पड़ी, उसके मन में लालच की घंटी बजी। वह मटकती हुई तरुण के पास पहुँची और मीठी आवाज में बोली, “अरे तरुण मालिक! राम-राम! बड़े खुशकिस्मत हैं जो आज खेत पर दर्शन हो गए। मालिक, मुझे ₹२००० की सख्त जरूरत है। घर में राशन-पानी खत्म है, मेहरबानी करके ₹२००० उधार दे दो, फसल आते ही लौटा दूंगी।”
तरुण पहले से ही अपने मानसिक तनाव और गुप्त कमजोरी के रहस्य से परेशान था। उसने कल्याणी को देखते ही नफ़रत से अपना मुँह फेर लिया और रूखे स्वर में कहा, “मेरे पास कोई फालतू पैसा नहीं है कल्याणी। यहाँ से चली जाओ, किसी और से माँगो।”
तरुण के साफ मना करने पर कल्याणी की नजर बगल में बैठे शंकर पर पड़ी। कल्याणी जानती थी कि शंकर किस मिजाज का इंसान है। कल्याणी ने मुस्कुराकर शंकर से कहा, “क्यों शंकर जी! क्या तुम्हारे पास भी अपने भाई की तरह जेब खाली है या अपनी इस गरीब बहन/महिला की मदद करोगे? मुझे ₹२००० दे दो ब्याज पर, अगले महीने लौटा दूंगी।”
शंकर, जो पहले से ही हवस का पुतला था और कल्याणी के जिस्म पर डोरे डालना चाहता था, आँखों ही आँखों में गंदा इशारा करते हुए बोला, “कल्याणी! पैसे तो मैं तुझे ₹२००० क्या, ₹४००० दे दूँगा! लेकिन मुफ़्त में कुछ नहीं मिलता। तुझे मेरे साथ उस सामने दिख रहे ईख (गन्ने) के घने खेत के अंदर चलना पड़ेगा।”
कल्याणी, जो खुद चाल-चलन से गिरी हुई थी, हँसकर बोली, “अरे शंकर! ईख के खेत में चलना कौन सी बड़ी बात है? लेकिन मेरी शर्त है—पहले पैसे मेरी हथेली पर रख, फिर खेत में चल!”
शंकर ने बिना एक पल गँवाए अपनी जेब से ₹२००० के करकरे नोट निकाले और कल्याणी के हाथ में थमा दिए। इसके बाद शंकर और कल्याणी दोनों खुलेआम पास के घने ईख के खेत में घुस गए।
लगभग आधे घंटे तक शंकर और कल्याणी ने उस खेत के अंदर अपनी शारीरिक हवस पूरी की। जब दोनों अपनी वासना शांत करके खेत से बाहर निकले, तो शंकर का चेहरा खिलखिला रहा था।
वे दोनों वापस तरुण के पास आए, जो खाट पर सिर पकड़कर बैठा हुआ था।
शंकर ने हँसते हुए तरुण की पीठ पर थपकी मारी और कहा, “अरे तरुण! तू भी क्या याद रखेगा! अगर तेरा मन भी थोड़ा बहलाने का हो, तो कल्याणी यहाँ खड़ी है। तू भी इसके साथ खेत में चला जा, थोड़ा मूड फ्रेश हो जाएगा!”
तरुण ने घृणा से कहा, “छिः शंकर! मुझे इन गंदे कामों में कोई दिलचस्पी नहीं है। तुम लोग मुझे बख्श दो।”
कल्याणी देवी ने जब तरुण का यह तिरस्कार देखा, तो उसे गुस्सा आ गया। कल्याणी ने अपने हाथ कमर पर रखे और भरे हुए लहजे में तीखा व्यंग्य करते हुए बोली, “अरे शंकर! तू इस तरुण को क्या कह रहा है? जो मर्द की खूबी तेरे अंदर है, वो इस ज़मींदार के बेटे में कहाँ! शंकर, तू तो शेर है! लेकिन यह तरुण? यह तो नामर्द है! ८ साल हो गए इसकी शादी को, आज तक अपनी जनाना (पत्नी) को एक चिड़िया का बच्चा तक नहीं दे पाया! यह क्या किसी औरत को खुश करेगा?”
कल्याणी के मुँह से सार्वजनिक रूप से निकला यह शब्द—“नामर्द!”—तरुण के दिल और दिमाग पर किसी जलते हुए तेज़ाब की तरह पड़ा।
तरुण का खून खौल उठा। उसकी गुप्त कमजोरी का जो जख्म अभी हरा था, उस पर कल्याणी ने नमक छिड़क दिया था। तरुण का आपा खो गया। वह झपटकर उठा और उसने अपनी पूरी ताकत से कल्याणी देवी के गाल पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया!
चटाक!
थप्पड़ इतना तेज था कि कल्याणी जमीन पर जा गिरी। उसके मुँह से खून की पतली धार निकल आई।
तमाचा खाते ही कल्याणी देवी नागिन की तरह फुंकार उठी। उसने गाँव में अपनी इज्जत की परवाह किए बिना जोर-जोर से चीखना-चिल्लाना और रोना शुरू कर दिया, “दौड़ो रे गाँव वालों! बचाओ! इस ज़मींदार के बेटे ने मुझे बेकसूर मार डाला! बचाओ!”
चीख-पुकार सुनकर आसपास के खेतों में काम कर रहे सात-आठ किसान दौड़ते हुए मौके पर पहुँच गए। किसानों ने कल्याणी को सँभाला और पूछा, “क्या हुआ कल्याणी? तू क्यों चीख रही है? तरुण ने तुझे क्यों मारा?”
कल्याणी अपने आँसू पोछते हुए चिल्लाई, “देखो पंचों! जब यह तरुण नामर्द है, तो नामर्द को नामर्द ही कहा जाएगा न! मैंने सिर्फ इतना ही तो कहा कि तू अपनी औरत को ८ साल में बच्चा नहीं दे सका, तू नामर्द है! इतने में इसने मुझ गरीब विधवा पर हाथ उठा दिया!”
बात अभी चल ही रही थी कि दूर से ट्रैक्टर पर आते हुए नागेश कुमार (तरुण के पिता) ने भीड़ देखी। नागेश कुमार ट्रैक्टर रोककर तुरंत भीड़ के पास पहुँचे।
नागेश ने कल्याणी को रोते और अपने बेटे तरुण को गुस्से में काँपते देखा। नागेश ने कड़ककर पूछा, “क्या तमाशा बना रखा है यहाँ? कल्याणी, तू मेरे बेटे के साथ क्यों झगड़ रही है?”
कल्याणी ने पंचों के सामने नागेश को ललकारते हुए कहा, “नागेश जी! अपने इस शहज़ादे से पूछो! इसने मुझे थप्पड़ मारा है। सिर्फ इसलिए कि मैंने इसे नामर्द कह दिया! अरे, जो बात पूरा गाँव जानता है, वही मैंने कही!”
नागेश कुमार, जो पहले से ही अपने बेटे से औलाद न होने के कारण खार खाए बैठे थे, इस सार्वजनिक बेइज्जती को बर्दाश्त नहीं कर पाए। पूरे गाँव के किसानों के सामने उनके इकलौते बेटे को ‘नामर्द’ कहा जा रहा था।
नागेश कुमार का अहंकार चकनाचूर हो गया। उन्होंने अपने बेटे का पक्ष लेने के बजाय, उलटे तरुण पर ही अपना गुस्सा उतारना शुरू कर दिया।
नागेश ने पूरे किसानों के सामने तरुण की कॉलर पकड़ी और डांटते हुए चिल्लाए, “घधे कहीं के! जब तू सचमुच का नामर्द है, तो अगर किसी ने तुझे नामर्द कह दिया तो इसमें गलत क्या है? ८ साल बीत गए मेरी बहू को लाए हुए, तूने आज तक एक चिड़िया का बच्चा पैदा करके नहीं दिखाया मुझे! मेरी २६ एकड़ जमीन की बलि चढ़ा दी तूने! और अब तू गाँव की औरतों पर हाथ उठा रहा है?”
गाँव के किसानों के सामने अपने ही सगे बाप के मुँह से ये शब्द सुनना—”जब तू सचमुच का नामर्द है”—तरुण के लिए मौत से भी बदतर था। तरुण का सिर शर्म से झुक गया। उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया।
नागेश कुमार ने कल्याणी देवी को अपनी जेब से ₹१००० का नोट निकालकर थमाया और कहा, “कल्याणी, मामला यहीं खत्म कर। पंचों, आप लोग भी अपने काम पर जाइए।”
मामला तो रफा-दफा हो गया, लेकिन तरुण के सीने में जो स्वाभिमान और पुरुषत्व की राख सुलग रही थी, वह अब एक खौफनाक प्रतिशोध की ज्वाला में बदलने वाली थी।
अध्याय ३: स्वाभिमान पर चोट और प्रतिशोध का बीजारोपण
शाम का धुंधलका ढल चुका था। हवेली में अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था। तरुण घर के आँगन की खाट पर बैठा हुआ गुमसुम टकटकी लगाए दीवार को घूर रहा था।
तभी नागेश कुमार हवेली में दाखिल हुए। उन्होंने तरुण को खाली बैठे देखा तो कड़क आवाज में बोले, “तरुण! कल सुबह ५ बजे उठकर पूर्व वाले खेत में पानी देना है। फसलें सूख रही हैं। ध्यान से चले जाना।”
तरुण ने अपनी आँखें ऊपर उठाईं। उसकी आँखों में बेबसी की जगह एक भयानक पथरीलापन आ चुका था।
तरुण ने ठंडे स्वर में कहा, “पिताजी, आज के बाद मैं कभी आपके खेतों में कदम नहीं रखूँगा। मैंने खेती-बाड़ी और घर का सारा काम छोड़ दिया है।”
नागेश कुमार का पारा चढ़ गया, “क्या बकवास कर रहा है? तू काम नहीं करेगा तो खेत क्या तेरा बाप सँभालेगा?”
“आप सँभालिए या किसी को रखिए,” तरुण ने जवाब दिया, “जिस बेटे को आप पूरे गाँव के सामने नामर्द कहकर ज़लील कर सकते हैं, उस बेटे का आपकी ज़मीन पर कोई हक नहीं है।”
नागेश ने गुस्से में पैर पटका, “ठीक है! मत कर काम! तू सोचता है कि तेरे बिना मेरी खेती रुक जाएगी? मैं कल ही गाँव से एक तगड़ा नौकर ढूँढकर लाता हूँ। वह मेरे खेतों में पानी भी देगा और काम भी करेगा!”
अगले दो-तीन दिनों तक बाप-बेटे के बीच बातचीत पूरी तरह बंद रही।
तारीख आ गई १५ जनवरी २०२६। सुबह के ८:०० बजे नागेश कुमार फिर तरुण के पास आए और बोले, “तरुण, अपनी जिद्द छोड़ दे। जो हुआ सो हुआ, खेत पर जाना शुरू कर।”
लेकिन तरुण ने अपने कान बंद कर लिए थे। उसके दिमाग में दिन-रात बस एक ही बात गूँज रही थी—’नामर्द… नामर्द… नामर्द!’
तरुण मन ही मन कसम खा चुका था: “मुझे इस नामर्द के दाग को मिटाना होगा। चाहे मुझे इसके लिए अपना ईमान, अपना धर्म और अपनी आत्मा ही क्यों न बेचनी पड़े! एक दिन ऐसा आएगा जब यह गाँव और मेरा बाप मुझे मर्द कहेंगे!”
जब तरुण ने खेत जाने से साफ इंकार कर दिया, तो नागेश कुमार हार मानकर गाँव की तरफ निकल गए। वे गाँव के ही एक २५ वर्षीय युवक के घर पहुँचे जिसका नाम था ‘दीपक’।
दीपक गाँव का एक अत्यंत निर्धन लेकिन शारीरिक रूप से बेहद आकर्षक और हट्टा-कट्टा नौजवान था। उसका कद ६ फीट लंबा था, चौड़ी छाती, सुडौल शरीर और पहलवानों जैसा जिस्म था। दीपक अक्सर बड़े ज़मींदारों के खेतों में दिहाड़ी-मजदूरी का काम किया करता था।
नागेश कुमार ने दीपक से कहा, “दीपक! मुझे अपने २६ एकड़ खेत की देखरेख और पानी देने के लिए एक स्थायी नौकर की जरूरत है। अगर तू मेरे घर और खेत का पूरा काम सँभालेगा, तो मैं तुझे महीने के ₹१४,००० नकद दूँगा।”
गरीब दीपक के लिए ₹१४,००० महीने की नौकरी बहुत बड़ी बात थी। वह तुरंत हाथ जोड़कर राजी हो गया, “मालिक! आपकी मेहरबानी। मैं कल से ही काम पर आ जाऊँगा।”
अगले ही दिन से ६ फीट लंबा पहलवान दीपक नागेश कुमार की हवेली और खेतों पर नौकर के रूप में काम करने लगा। दीपक भोर में खेतों में चला जाता, हल चलाता, पानी देता और दोपहर में हवेली आकर भारी सामान उठाने या मवेशियों को चारा देने का काम करता।
लेकिन दीपक के अंदर भी एक खोट था। वह खूबसूरत औरतों का बेहद शौकीन था।
जब दीपक हवेली में काम करने आता, तो उसकी नीयत तरुण की खूबसूरत पत्नी संजना पर डगमगाने लगती। संजना जब आँगन में झाड़ू लगाती या कपड़े सुखाती, तो दीपक छिप-छिपकर उसके सुडौल जिस्म और गोरे चेहरे को ठरकी नजरों से निहारता। संजना इस बात से अनजान थी, लेकिन दीपक के मन में हवस के अंकुर फूटने लगे थे।
उधर, तरुण अपने कमरे में बैठकर एक ऐसी खौफनाक और घिनौनी योजना बना रहा था, जिसकी कल्पना कोई भी शरीफ इंसान नहीं कर सकता था।
अध्याय ४: खौफनाक सौदा और आंसुओं की आहुति
समय बीतता गया और तारीख आई २५ जनवरी २०२६।
सुबह के १०:०० बजे का समय था। दीपक खेत का काम खत्म करके हवेली के बाहरी हिस्से में औजार रख रहा था। तभी तरुण उसके पास पहुँचा।
तरुण ने दीपक के कंधे पर हाथ रखा और बेहद धीमी आवाज में कहा, “दीपक! मुझे आपसे एक बहुत ही जरूरी और गुप्त बात करनी है। मेरे साथ दूर वाले खेत में चलो।”
दीपक थोड़ा हैरान हुआ, लेकिन अपने मालिक के बेटे के पीछे-पीछे खेत में चला गया।
खेत के एकांत नलकूप पर पहुँचकर तरुण ने बीड़ी जलाई और दीपक की तरफ देखा।
तरुण ने कहा, “दीपक, तुम बहुत गरीब हो। तुम्हारे घर की छत टपकती है, माँ बीमार रहती है। अगर मैं तुम्हें एक ही झटके में ₹५ लाख रुपये नकद दे दूँ, तो तुम्हारी गरीबी दूर हो जाएगी न?”
₹५ लाख रुपये का नाम सुनते ही दीपक की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने काँपती आवाज में कहा, “छोटे मालिक! ५ लाख रुपये? इतनी बड़ी रकम! इसके लिए तो मुझे अपनी जान भी देनी पड़े तो दे दूँगा। बताइए मुझे क्या काम करना होगा?”
तरुण ने इधर-इधर देखा और फिर बेहद ठंडे, घटिया और दिल दहला देने वाले लहजे में अपना प्लान बताया।
“दीपक… तुम्हें कोई मर्डर या चोरी नहीं करनी है। बात यह है कि मेरी शादी के आठ साल बीत चुके हैं, लेकिन मेरी कोई संतान नहीं है। पूरा गाँव और मेरे पिताजी मुझे ‘नामर्द’ कहते हैं। मैं इस नामर्द के कलंक को मिटाना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि तुम मेरी पत्नी संजना के साथ शारीरिक संबंध बनाओ… और उसे गर्भवती करके मुझे एक वारिस दे दो!”
यह सुनते ही ६ फीट का पहलवान दीपक सन्न रह गया। वह चुपचाप तरुण का चेहरा देखने लगा। उसके दिमाग में एक तरफ संजना का वह कामुक खूबसूरत चेहरा घूम गया जिसे वह रोज निहारता था, और दूसरी तरफ ₹५ लाख की भारी-भरकम रकम!
तरुण ने दीपक की चुप्पी को उसकी सहमति समझ लिया। तरुण ने दीपक के हाथ पर हाथ रखते हुए कहा, “दीपक, यह बात सिर्फ मेरे, तुम्हारे और संजना के बीच रहेगी। किसी चौथे इंसान को पता चला तो मैं तुम्हें जान से मार दूँगा। अगर संजना गर्भवती हो गई, तो ₹५ लाख रुपये तुम्हारे!”
दीपक के मुँह में पानी आ गया। उसने तुरंत अपना सिर हिला दिया, “मंजूर है छोटे मालिक! जैसा आप कहें।”
योजना पक्की हो गई। अब सबसे बड़ी चुनौती थी संजना को इस पाप के लिए राजी करना।
उसी शाम जब सूरज ढल गया और नागेश कुमार गाँव की चौपाल में ताश खेलने चले गए, तो तरुण अपने कमरे में आया। संजना बिस्तर पर बैठी हुई थी।
तरुण ने कमरा अंदर से बंद किया और संजना के पैरों के पास बैठ गया।
तरुण ने बहुत ही भारी मन से कहा, “संजना… आज तुम्हें मेरी एक बात माननी होगी। अगर तुमने मेरी बात नहीं मानी, तो हमारा यह परिवार बिखर जाएगा।”
संजना ने पूछा, “क्या बात है तरुण जी? आप इतने परेशान क्यों हैं?”
तरुण ने अपनी आँखें नीची करते हुए कहा, “संजना… डॉक्टर ने मुझे कह दिया है कि मैं कभी पिता नहीं बन सकता। मैं नामर्द हूँ। और मेरे पिताजी मुझे रोज घसीटते हैं। इसलिए मैंने एक फैसला किया है। तुम्हें हमारे नौकर दीपक के साथ रातें गुजारनी पड़ेंगी… ताकि तुम दीपक के बच्चे की माँ बन सको और दुनिया की नजरों में वह बच्चा मेरा कहलाए!”
जैसे ही संजना के कानों में अपने पति के मुँह से ये नीच शब्द पड़े, मानो उसके सिर पर आकाशीय बिजली गिर पड़ी हो!
संजना झटके से खाट से खड़ी हो गई। उसका पूरा शरीर गुस्से और घृणा से काँपने लगा।
“क्या कहा आपने?” संजना चीखी, “आप अपने ही हाथों अपनी पत्नी का सौदा एक नौकर से कर रहे हैं? क्या आपका ज़मीर मर चुका है तरुण जी? एक औरत के लिए उसका पति ही सब कुछ होता है। मैं भूखी रह लूँगी, बेऔलाद मर जाऊँगी, लेकिन किसी पराए मर्द या नौकर को अपने जिस्म को हाथ तक नहीं लगाने दूँगी! छीः! आपको शर्म नहीं आती ऐसा नीच प्रस्ताव रखते हुए?”
संजना रोने लगी और कड़े शब्दों में मना कर दिया।
लेकिन तरुण पर तो ‘मर्द’ साबित होने का जुनून सवार था। वह संजना के सामने घुटनों के बल बैठ गया और अपनी जेब से जहर की एक छोटी शीशी निकाली।
तरुण ने काँपते हाथों से जहर की शीशी संजना के सामने रखी और खौफनाक लहजे में बोला, “संजना! अगर तुम आज रात दीपक के पास नहीं गई, तो मैं अभी इसी वक्त तुम्हारे सामने यह जहर पीकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर लूँगा! फिर तुम विधवा बनकर पूरी जिंदगी गाँव भर के ताने सहना! मैं नामर्द की जिंदगी नहीं जी सकता संजना… मुझे बचा लो! मुझे एक वारिस दे दो, चाहे वह किसी का भी हो!”
पति के इस इमोशनल ब्लैकमेल और आत्महत्या की धमकी के आगे एक भारतीय नारी की हिम्मत टूट गई। संजना फूट-फूटकर रोने लगी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह अपने पति की जान बचाए या अपने सत-धर्म की रक्षा करे।
अंततः, पति की जान बचाने और उसके पागलपन के आगे संजना ने रोते हुए अपना सिर झुका दिया।
पाप का रास्ता साफ हो चुका था।
अध्याय ५: बंद कमरा और बदलती भावनाएँ
रात के ठीक ९:०० बज चुके थे। हवेली के नीचे वाले हिस्से में नागेश कुमार गहरे खर्राटे ले रहे थे।
तरुण ने अपनी छत से दीपक को फोन किया, “दीपक, सब तैयार है। रात १०:०० बजे हवेली के पीछे वाले छोटे दरवाजे से चुपचाप ऊपर वाले कमरे में आ जाओ।”
रात १०:०० बजे, जब पूरा केसर देसर गाँव सो रहा था, ६ फीट लंबा नौकर दीपक दबे पाँव हवेली में दाखिल हुआ। तरुण ने खुद सीढ़ियों पर खड़े होकर पहरा दिया और दीपक को संजना के बेडरूम का दरवाजा दिखाकर ढकेल दिया।
कमरे के अंदर लैंप की हल्की पीली रोशनी जल रही थी। संजना लाल साड़ी पहने, मुँह पर पल्लू गिराए बिस्तर के कोने में काँपती हुई बैठी थी। उसकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे।
दीपक कमरे में घुसा और उसने अंदर से कुंडी चढ़ा ली।
शुरुआत में संजना ने दीपक को छूने से मना किया और पीछे हटी। लेकिन दीपक, जो शारीरिक रूप से बलवान था और जिसके सिर पर हवस सवार थी, उसने संजना को अपनी बाहों में भर लिया। संजना ने अपनी किस्मत को कोसते हुए अपनी आँखें मूँद लीं।
उस काली रात में, अपने ही पति की रजामंदी और पहरेदारी में, एक बेबस पत्नी का जिस्म नौकर की हवस की बलि चढ़ गया।
काम खत्म होने के बाद, देर रात लगभग १२:०० बजे दीपक कमरे से बाहर निकला। तरुण बाहर ही खड़ा था। तरुण ने दीपक को चुपचाप हवेली के पीछे के दरवाजे से बाहर निकाला और उसके घर तक छोड़कर आया।
अब यह घिनौना खेल रोजाना का नियम बन गया।
हर दूसरे-तीसरे दिन, रात १०:०० बजे तरुण अपने नौकर दीपक को अपने घर बुलाता। नागेश कुमार के सोने के बाद, तरुण खुद पहरा देता और अपने नौकर को अपनी पत्नी के कमरे में भेज देता। दीपक और संजना बंद कमरे में घंटों एक-दूसरे के साथ शारीरिक संबंध बनाते।
लेकिन इंसानी दिमाग और भावनाओं का खेल बड़ा विचित्र होता है।
शुरुआत के १०-१२ दिनों तक तो संजना इस काम को एक मजबूरी और यातना मानकर सहती रही। लेकिन धीरे-धीरे पासा पलटने लगा।
तरुण संजना को कभी प्यार नहीं दे पाता था। वह चिड़चिड़ा था और उसमें पुरुषत्व की कमी थी। दूसरी तरफ, दीपक एक सुडौल, ६ फीट का नौजवान था जो संजना को अपनी बाहों में भरकर असीम शारीरिक सुख और गर्माहट देता था।
एक महीना बीतते-बीतते, संजना जो कभी मजबूरी में रोती थी, अब खुद दीपक का इंतजार करने लगी।
दीपक के स्पर्श ने संजना के भीतर सोई हुई वासना और प्यास को जगा दिया था। संजना अपने ही नौकर दीपक के प्यार और जिस्म की दीवानी हो चुकी थी। अब वह उसे केवल नौकर नहीं, बल्कि अपना असली प्रेमी और परमेश्वर मानने लगी थी।
इसी बीच तरुण ने अपनी बात रखते हुए अपने बैंक खाते से निकालकर ₹५ लाख रुपये नकद दीपक के हवाले कर दिए। दीपक पैसे पाकर बेहद खुश था, और साथ में उसे ज़मींदार की खूबसूरत पत्नी का सुंदर जिस्म मुफ्त में भोगने को मिल रहा था।
अध्याय ६: दो दिन का बुलावा और वासना का जाल
वक्त का पहिया घूमता रहा और तारीख आ गई ५ मार्च २०२६।
सुबह के करीब ८:०० बजे तरुण घर में बैठा हुआ था कि तभी उसके दोस्त शंकर का फोन आया।
शंकर ने कहा, “अरे तरुण! मेरी बहन के घर (दूसरे जिले में) एक बड़ा पारिवारिक कार्यक्रम है। तुझे मेरे साथ चलना पड़ेगा। हम आज जाएँगे और दो दिन बाद लौटेंगे।”
तरुण ने सोचा कि दो दिन बाहर घूमने से उसका दिमाग हल्का हो जाएगा। उसने तुरंत हाँ भर दी।
तरुण अपनी पत्नी संजना के पास गया और बोला, “संजना, मैं शंकर के साथ उसकी बहन के यहाँ जा रहा हूँ। मुझे लौटने में दो दिन लगेंगे। दो रातें मैं घर पर नहीं रहूँगा। तुम घर का ध्यान रखना।”
यह सुनकर संजना के मन में एक बुरी शहवत जागी। उसने सोचा, “पति दो दिन के लिए शहर से बाहर जा रहा है। ससुर जी दिन भर खेत में रहते हैं। क्यों न इस मौके का फायदा उठाकर दिन में ही दीपक को अपने कमरे में बुला लिया जाए!”
तरुण अपना बैग उठाकर शंकर के साथ रवाना हो गया।
तरुण के जाने के ठीक १५ मिनट बाद, नौकर दीपक खेत में काम करने के लिए हवेली पहुँचा। हवेली में नागेश कुमार मौजूद थे। नागेश कुमार ने दीपक से कहा, “चल दीपक, आज उत्तर वाले खेत में खाद डालनी है, मेरे साथ खेत चल।”
दीपक अपने मालिक नागेश के साथ खेत पर चला गया और काम में लग गया।
उधर हवेली में अकेली संजना का जिस्म दीपक की तलब में तड़प रहा था। सुबह के लगभग ११:०० बज रहे थे। संजना से रहा नहीं गया। उसने अपना मोबाइल उठाया और नौकर दीपक के नंबर पर फोन मिला दिया।
खेत में खाद डाल रहे दीपक की जेब में फोन बजा। दीपक ने छिपकर फोन उठाया।
दूसरी तरफ से संजना की मदहोश और उत्तेजक आवाज आई, “दीपक… कहाँ हो तुम? तरुण दो दिन के लिए शहर से बाहर गए हैं। घर में कोई नहीं है। मुझसे अब बर्दाश्त नहीं हो रहा… तुम इसी वक्त किसी भी बहाने से हवेली आ जाओ। मुझे तुम्हारा साथ चाहिए!”
दीपक के खून में भी हवस का उबाल आ गया। उसने कहा, “लेकिन मालिक (नागेश) तो मेरे साथ ही खेत पर हैं!”
“कोई बहाना बनाओ और तुरंत आओ!” संजना ने हुक्म दिया और फोन काट दिया।
दीपक ने तुरंत अपना माथा पकड़ा और कराहते हुए नागेश कुमार के पास पहुँचा।
दीपक ने झूठी लाचारी दिखाते हुए कहा, “मालिक! गाँव से मेरी पड़ोसी का फोन आया था। मेरी माँ की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गई है, उन्हें तेज दौरा पड़ा है। मुझे तुरंत गाँव जाकर माँ को अस्पताल ले जाना होगा। आप मुझे दो घंटे की छुट्टी दे दीजिए!”
नागेश कुमार एक दयालु ज़मींदार थे। उन्होंने दीपक के कंधे पर हाथ रखा और कहा, “अरे! माँ की तबीयत खराब है तो तुरंत जा! रुक, मैं अपनी बाइक से तुझे घर छोड़ देता हूँ।”
दीपक घबरा गया, “नहीं-नहीं मालिक! आप खेत का काम देखिए, मैं पैदल ही दौड़कर निकल जाऊँगा।”
दीपक खेत से निकला, लेकिन वह अपने घर जाने के बजाय पगडंडी के रास्ते सीधे नागेश कुमार की हवेली की तरफ भाग खड़ा हुआ।
हवेली पहुँचकर दीपक ने पीछे का दरवाजा खटखटाया। संजना पहले से ही दरवाजे पर खड़ी थी। उसने मुस्कुराते हुए दरवाजा खोला, दीपक का हाथ पकड़ा और झटके से उसे अपने बेडरूम के अंदर खींच लिया।
कमरे की कुंडी अंदर से बंद कर दी गई। दोनों अपनी वासना की आग में इस कदर अंधे हो चुके थे कि उन्हें दुनियादारी, समय और खौफ का कोई ध्यान नहीं रहा। दोनों कपड़े उतारकर एक-दूसरे में खो गए।
लेकिन नीयति ने उन दोनों के लिए कुछ और ही दर्दनाक अंजाम लिख रखा था।
अध्याय ७: लालच, पकड़ और कुल्हाड़ी का खूनी न्याय
खेत पर मौजूद नागेश कुमार को अचानक याद आया कि वे अपना बटुआ और एंड्रॉइड मोबाइल फोन हवेली के कमरे में ही भूल आए हैं। बिना फोन के उन्हें एक व्यापारी को फसल का भुगतान करना था।
नागेश कुमार ने सोचा, “खेत का काम तो चल ही रहा है, मैं ५ मिनट में हवेली जाकर अपना फोन और बटुआ ले आता हूँ।”
नागेश कुमार अपनी मोटरसाइकिल उठाकर हवेली की तरफ चल दिए।
दोपहर के लगभग १२:१५ बजे नागेश कुमार अपनी हवेली के मुख्य दरवाजे पर पहुँचे। उन्होंने देखा कि बाहर का दरवाजा तो सटा हुआ था, लेकिन अंदर का मुख्य लकड़ी का दरवाजा मजबूती से बंद था।
नागेश कुमार ने दरवाजे पर दस्तक दी और आवाज लगाई, “संजना! ओ बहू! दरवाजा खोल, मैं अपना मोबाइल भूल गया था!”
अंदर बेडरूम में दीपक की बाहों में लिपटी संजना के कानों में जब अपने ससुर की गरजती आवाज पड़ी, तो उसके जिस्म से पसीना छूट गया!
संजना के होश उड़ गए। उसने बदहवासी में दीपक को धकेला, “भागो दीपक! पिताजी आ गए!”
दीपक भी नंगे बदन काँपने लगा। कमरे में कोई खिड़की या भागने का दूसरा रास्ता नहीं था। दीपक ने जल्दी-जल्दी अपनी पैंट पहनी और खाट के पीछे छिपने की कोशिश करने लगा।
संजना ने काँपते हाथों से अपने कपड़े ठीक किए, चेहरे का पसीना पोछा और अपने बिखरे बालों को सँभाला। उसका दिल १५० की रफ्तार से धड़क रहा था।
नागेश कुमार बाहर से दोबारा चिल्लाए, “संजना! इतनी देर क्यों लग रही है?”
संजना ने काँपती हुई आवाज में मुख्य दरवाजा खोला, “जी… जी पिताजी! वो मैं नहा रही थी, इसलिए देर हो गई।”
नागेश कुमार ने अपनी बहू के चेहरे को देखा। संजना का चेहरा लाल-सुर्ख था, माथे पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं और उसकी सांसें उखड़ रही थीं।
एक अनुभवी बूढ़े ज़मींदार की पारखी नजरों ने ताड़ लिया कि दाल में कुछ काला है।
“तू इतनी घबराई हुई क्यों है?” नागेश कुमार ने शक से पूछा।
“कुछ नहीं पिताजी… आप बैठिए, मैं आपका फोन लाती हूँ,” संजना ने बात टालनी चाही।
लेकिन नागेश कुमार उसकी बात सुने बिना सीधे अपने कमरे की तरफ बढ़े। जैसे ही नागेश कुमार बेडरूम के दरवाजे पर पहुँचे, उनकी नजर खाट के पीछे छिपे ६ फीट लंबे नौकर दीपक पर पड़ी!
दीपक बिना शर्ट के, बदहवास हालत में खाट के पीछे छिपा हुआ था। कमरे में संजना के बिखरे हुए कपड़े और कामुक गंध साफ बता रही थी कि यहाँ क्या खेल चल रहा था!
नागेश कुमार की आँखों के सामने खून उतर आया। उनकी २६ एकड़ की ज़मींदारी, हवेली की इज्जत और वंश की मर्यादा एक झटके में चकनाचूर हो चुकी थी। उनकी बहू उनके ही खेत के नौकर के साथ उनके बिस्तर पर मुंहकाला कर रही थी!
“हरामजादे! तेरी यह हिम्मत!” नागेश कुमार दहाड़े और उन्होंने लपककर दीपक की गर्दन पकड़ ली।
नागेश कुमार ने ६ फीट के पहलवान दीपक को थप्पड़ों और घूँसों से पीटना शुरू कर दिया।
दीपक अपनी जान बचाने के लिए हाथ जोड़कर नागेश के पैरों में गिर पड़ा और गिड़गिड़ाते हुए सच उगल दिया, “मालिक! मुझे मारो मत! मुझे बख्श दो मालिक! इसमें मेरी कोई गलती नहीं है! इस काम के लिए मुझे आपके बेटे तरुण ने ₹५ लाख रुपये दिए थे! तरुण ने ही मुझे अपनी पत्नी के पास भेजा था ताकि मैं उसे बच्चा दे सकूं!”
लेकिन नागेश कुमार का गुस्सा इस कदर बेकाबू हो चुका था कि उनके कानों में दीपक की एक भी बात नहीं पड़ी। उन्हें लगा कि नौकर अपनी जान बचाने के लिए उनके बेटे पर झूठा इल्जाम लगा रहा है।
“कुत्ते! तू मेरी बहू के साथ ज़िना करता है और मेरे ही बेटे पर इल्जाम लगाता है!”
नागेश कुमार का दिमाग पूरी तरह सनक गया। वे भागकर आँगन में गए, जहाँ लकड़ी फाड़ने वाली लोहे की एक भारी-भरकम, धारदार कुल्हाड़ी (Axe) रखी हुई थी।
नागेश कुमार ने दोनों हाथों से कुल्हाड़ी उठाई और काल बनकर बेडरूम में दाखिल हुए।
दीपक अभी जमीन से उठने की कोशिश ही कर रहा था कि नागेश कुमार ने अपनी पूरी ताकत से कुल्हाड़ी का पहला वार दीपक की गर्दन और सिर के जोड़ पर दे मारा!
छपाक!
खून का एक भयानक फव्वारा छूटा और कमरे की सफेद दीवारें लाल हो गईं।
दीपक की आँखें बाहर निकल आईं और वह चीख भी नहीं पाया। नागेश कुमार ने बिना दया दिखाए दूसरी, तीसरी और चौथी बार कुल्हाड़ी दीपक के खोपड़ी के बीचों-बीच मार दी। दीपक का सिर तरबूज की तरह फट गया और उसका ६ फीट का जिस्म तड़प-तड़पकर ठंडा पड़ गया। मौके पर ही दीपक नौकर की मौत हो गई!
दीपक का कुचला हुआ शव और खून का पोखरा देखकर संजना कोने में खड़े होकर जोर-जोर से चीखने लगी, “बचाओ! बचाओ! पिताजी छोड़ दीजिए!”
दीपक का कत्ल करने के बाद, नागेश कुमार का खूनी जुनून शांत नहीं हुआ। वे खून से सनी कुल्हाड़ी लेकर अपनी बहू संजना की तरफ घूमे। उनकी आँखों में केवल और केवल हवस और बेवफाई का प्रतिशोध तैर रहा था।
“तूने मेरी कुल की मर्यादा मिट्टी में मिला दी रांड!” नागेश गरज उठे।
संजना ने काँपते हुए हाथ जोड़े, “पिताजी! मुझे माफ कर दीजिए! यह सब तरुण के कहने पर…”
इससे पहले कि संजना अपनी बात पूरी कर पाती, नागेश कुमार ने कुल्हाड़ी का भयंकर वार सीधे संजना के सिर पर कर दिया!
थप्प!
संजना जमीन पर गिर पड़ी। नागेश कुमार ने रुकने के बजाय तीन-चार बार लगातार कुल्हाड़ी संजना के चेहरे और गर्दन पर दे मारी। संजना का सुंदर चेहरा खून के लोथड़े में बदल गया। कुछ ही सेकंड में संजना ने भी तड़पते हुए अपने प्राण त्याग दिए!
मात्र १० मिनट के खेल में, उस बंद कमरे में दो लाशें खून से लथपथ पड़ी थीं—एक घर की बहू और दूसरा घर का नौकर।
अध्याय ८: पुलिस की रेड, जेल की सलाखें और अंतिम सामाजिक विमर्श
हवेली के अंदर से आ रही खौफनाक चीखों और कत्ल की आवाजें सुनकर पास-पड़ोस के लोग हवेली के बाहर इकट्ठा हो गए।
जब गाँव के दो-तीन हिम्मतवाले पुरुषों ने हवेली का दरवाजा खोलकर अंदर झाँका, तो बेडरूम का दृश्य देखकर उनकी रूह काँप गई!
पूरे कमरे में खून का दरिया बह रहा था। ५५ वर्षीय नागेश कुमार हाथ में खून से सनी कुल्हाड़ी लिए, खुद भी खून में लथपथ, लाशों के पास शांत मुद्रा में बैठे हुए थे।
गाँव के सरपंच ने तुरंत काँपते हाथों से बीकानेर के स्थानीय पुलिस स्टेशन को १०० नंबर पर फोन मिलाया।
लगभग पौने घंटे के भीतर बीकानेर पुलिस की तीन गाड़ियाँ, भारी पुलिस बल और फोरेंसिक टीम केसर देसर गाँव की हवेली में पहुँच गई। पुलिस अधिकारियों ने जब कमरे के अंदर का भयावह दृश्य देखा, तो वे भी सन्न रह गए।
पुलिस ने तुरंत दोहरे हत्याकांड के आरोपी नागेश कुमार को मौके से गिरफ्तार कर लिया और हत्या में इस्तेमाल की गई खून से सनी कुल्हाड़ी को सीज कर दिया।
दीपक और संजना के शवों का पंचनामा करके उन्हें सील बंद गाड़ियों में पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवा दिया गया।
जब पुलिस नागेश कुमार को हथकड़ी लगाकर थाने ले आई और कड़ाई से पूछताछ शुरू की, तो नागेश कुमार ने बिना किसी झिझक के अपना जुर्म कबूल कर लिया।
नागेश कुमार ने पुलिस कमिश्नर के सामने रोते हुए कहा, “साहब! मुझे अपने किए पर कोई पछतावा नहीं है। उस नौकर और मेरी बहू ने मिलकर मेरी पीढ़ी-दर-पीढ़ी की इज्जत को मिट्टी में मिला दिया था। मेरे बेटे के गैरहाजिरी में वे दोनों मेरे ही घर में नंगा नाच कर रहे थे। मैंने अपनी कुल की मर्यादा की बलि चढ़ाने वालों को सजा दी है!”
उधर, जब शहर गए पति तरुण को इस दोहरे हत्याकांड की खबर मिली, तो उसके पैरों तले की जमीन खिसक गई। वह बदहवास हालत में थाने पहुँचा।
जब पुलिस ने तरुण से अकेले में कड़ाई से पूछताछ की और दीपक द्वारा नागेश से कहे गए आखिरी शब्दों (₹५ लाख रुपये वाले सौदे) के बारे में पूछा, तो तरुण फूट-फूटकर रो पड़ा।
तरुण ने रोते हुए कबूल किया कि उसी ने नामर्द के तानों से बचने के लिए ₹५ लाख रुपये में अपने नौकर दीपक को अपनी पत्नी के साथ संबंध बनाने के लिए राजी किया था।
यह कड़वा सच सुनकर पुलिस अफसर भी दंग रह गए। जिस नामर्द शब्द के डर से तरुण ने अपनी पत्नी का सौदा किया था, उसी सौदे ने उसकी पत्नी और उसके नौकर की जान ले ली और उसके पिता को उम्रकैद की सलाखों के पीछे पहुँचा दिया!
पुलिस ने नागेश कुमार के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा १०३ (हत्या) के तहत मामला दर्ज कर कोर्ट में चार्जशीट पेश कर दी। नागेश कुमार को जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया गया, जहाँ वे अपनी जिंदगी के आखिरी दिन अदालत के फैसले के इंतजार में गिन रहे हैं।
निष्कर्ष और सामाजिक विवेचना
राजस्थान के बीकानेर जिले के केसर देसर गाँव में घटी यह खौफनाक वारदात महज एक अपराध कथा नहीं है, बल्कि यह हमारे समाज की सड़ चुकी सामंती सोच, झूठे स्वाभिमान और अनैतिक फैसलों का एक कड़वा और ज्वलंत दस्तावेज है।
यह घटना हमें कई गंभीर सामाजिक सवालों से रूबरू कराती है:
१. वंश और वारिस का अंधा जुनून: समाज में आज भी बेटों और वारिस को लेकर इस कदर अंधापन है कि लोग इंसानियत और रिश्तों की मर्यादा भूल जाते हैं। नागेश कुमार का अपने बेटे को दिन-रात ‘वारिस’ के लिए ताने देना ही इस पूरी त्रासदी की पहली नींव बना।
२. पुरुषत्व का मिथ्या अहंकार: तरुण ने अपनी गुप्त शारीरिक कमी को स्वीकार करने और वैज्ञानिक/चिकित्सकीय रास्ता (जैसे गोद लेना या विधिक उपचार) चुनने के बजाय, अपने झूठे पुरुषत्व और ‘नामर्द’ शब्द के डर से अपनी सगी पत्नी का सौदा नौकर से कर दिया। पति का यह एक गलत फैसला दो जिंदगियों की मौत का कारण बना।
३. अनैतिकता का दर्दनाक अंत: संजना और दीपक का रिश्ता भले ही मजबूरी और सौदे से शुरू हुआ था, लेकिन बाद में वासना और अनैतिकता के जाल ने उन्हें इतना अंधा कर दिया कि वे सही और गलत का फर्क भूल गए।
अदालत की दहलीज पर नागेश कुमार के कानूनी भाग्य का फैसला होना अभी बाकी है, लेकिन इस पूरी त्रासदी ने केसर देसर गाँव की उस आलीशान हवेली को हमेशा-हमेशा के लिए विरान और श्मशान बना दिया।
यह कहानी समाज को एक कड़ा संदेश देती है कि “जब इंसान अपने स्वाभिमान और वंश के नाम पर अनैतिकता और पाप का रास्ता चुनता है, तो उसका अंत केवल और केवल तबाही, खून और सलाखों के रूप में ही होता है।”