लड़की की सौतेली मां ने उसकी शादी एक बूढ़े से करवा दी
विश्वासघात की अग्नि से सम्मान का सफर: सौतेली मां का /सौदा/ और शीला का नया सवेरा
भाग १: बचपन की छाया और ममता का अंत
उत्तर प्रदेश के एक छोटे से शांत गाँव में धूल भरी गलियों के बीच एक कच्चा मकान था। इसी मकान में नन्ही शीला का जन्म हुआ था। जब शीला महज पाँच वर्ष की थी, तब उसकी माँ की अचानक गंभीर बीमारी के कारण मृत्यु हो गई। माँ का आंचल उठते ही ५ साल की मासूम बच्ची की दुनिया जैसे रातों-रात उजड़ गई। शीला को तो ठीक से अपनी माँ का चेहरा भी याद नहीं था, बस याद थी तो उनकी लोरियाँ और उनकी गोद की वह सोंधी सी खुशबू, जो अक्सर रात के सन्नाटे में उसे सुरक्षा का अहसास कराती थी।
माँ के चले जाने के बाद शीला के पिता, रामदीन, पूरी तरह टूट गए। लेकिन इस टूटन को सँभालने के बजाय रामदीन ने /शराब/ का सहारा ले लिया। सुबह की पहली किरण से लेकर रात के घने अंधेरे तक, रामदीन सिर्फ और सिर्फ /नशे/ में धुत रहता था। घर की देखभाल करना, नन्ही शीला का हाल पूछना या उसके खाने-पीने की चिंता करना, रामदीन के लिए बेमानी हो चुका था। जब कभी वह /नशे/ की हालत में घर लौटता, तो नन्ही शीला को छोटी-छोटी बातों पर डांटता-फटकारता और उस पर चिल्लाता।
गाँव के लोगों को उस नन्ही मासूम पर दया तो आती थी, लेकिन रामदीन के /शराबी/ स्वभाव के कारण कोई भी उनके पारिवारिक मामलों में बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था। माँ के देहांत के कुछ ही महीनों बाद रामदीन ने अपनी /शराब/ की लत और घर के कामकाज का बहाना बनाकर दूसरी शादी करने का फैसला किया। इस तरह घर में मालती का आगमन हुआ—शीला की सौतेली माँ।
भाग २: कांच का घर और नौकर की जिंदगी
मालती उम्र में रामदीन से काफी छोटी और दिखने में बहुत सुंदर थी। लेकिन उसकी सुंदरता के पीछे एक अत्यधिक स्वार्थी, निष्ठुर और अहंकरी मन छिपा था। मालती को सजने-संवरने का बेहद शौक था। वह दिन का अधिकांश समय ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़े होकर बाल बनाने, तरह-तरह के क्रीम-पाउडर लगाने और नए-नए कपड़े पहनकर दर्पण में खुद को निहारने में ही बिता देती थी।
घर आते ही मालती ने अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया। उसने घर का सारा कामकाज—झाड़ू-पोंछा, बर्तन धोना, कपड़े धोना, मवेशियों को चारा देना और चूल्हा फूंकना—सब कुछ छोटी सी शीला के कंधों पर डाल दिया। मालती खुद एक तिनका भी नहीं उठाती थी। अगर शीला से कभी काम करने में थोड़ी सी भी चूक हो जाती या उसकी तबीयत खराब होने के कारण काम में देरी हो जाती, तो मालती उस पर /कठोर/ वचनों के बाण चला देती।
“री कामचोर! दिन भर बैठी-बैठी मुफ्त की रोटियाँ तोड़ती है! काम करने में तेरा जी चुराता है और खाने के समय सबसे पहले आगे आती है!” मालती के ये /तीखे/ शब्द शीला के मासूम दिल को छलनी कर देते थे।
यही नहीं, मालती शीला के खाने-पीने में भी भारी भेदभाव करती थी। खुद और रामदीन के लिए तो वह गरम-गरम खाना और सब्जियाँ बनाती, लेकिन शीला के हिस्से में सिर्फ सूखी /बासी/ रोटियाँ और बची-खुची /बासी/ सब्जी ही आती। कभी-कभी तो शीला को सिर्फ नमक और पानी के साथ सूखी रोटी खाकर ही सो जाना पड़ता था।
शीला के पढ़ने-लिखने की उम्र आई, तो गाँव के अन्य बच्चे बस्ता उठाकर प्राथमिक विद्यालय जाने लगे। शीला का भी बहुत मन था कि वह स्कूल जाए, अक्षर सीखे और पढ़े-लिखे। लेकिन मालती ने उसे साफ मना कर दिया। मालती का कहना था, “लड़की को पढ़ा-लिखाकर कौन सा अफसर बनाना है? घर का काम सीखेगी तो वही काम आएगा।” रामदीन ने भी /शराब/ के /नशे/ में मालती की हाँ में हाँ मिला दी। इस तरह शीला की शिक्षा का सपना बचपन में ही घोंट दिया गया। शीला पूरी तरह अनपढ़ रह गई और अपने ही घर में एक नौकरानी की तरह पिसती रही।
भाग ३: कुचक्र और बद्रीनाथ का आगमन
समय पंख लगाकर उड़ता गया। देखते ही देखते शीला १८-१९ वर्ष की एक अत्यंत रूपवती और भोली-भाली युवती बन गई। अभावों और /प्रताड़ना/ में पली-बढ़ी होने के बावजूद उसके चेहरे पर एक सादगी और निश्छल चमक थी। उसकी ढलती उम्र को देखकर गाँव के लोग भी दबी ज़बान में कहने लगे थे कि अब शीला की शादी कर देनी चाहिए।
लेकिन मालती के मन में तो कुछ और ही /कुचक्र/ चल रहा था। वह शीला के लिए कोई योग्य, सुंदर या हमउम्र लड़का नहीं खोजना चाहती थी। मालती हमेशा से शीला से /द्वेष/ रखती थी और चाहती थी कि शीला जीवन भर /तकलीफ/ और /लाचारी/ में ही जिए।
इसी दौरान मालती को पास के गाँव के एक धनी लेकिन अत्यधिक उम्रदराज व्यक्ति के बारे में पता चला। उस व्यक्ति का नाम बद्रीनाथ था। बद्रीनाथ की उम्र लगभग ५५ से ६० वर्ष के बीच थी। वह दो बार विधुर हो चुका था, लेकिन उसके पास अकूत धन-दौलत, खेत-खलिहान और पक्के मकान थे। धन की कोई कमी न होने के कारण बद्रीनाथ किसी भी कीमत पर एक कम उम्र की सुंदर लड़की से तीसरी शादी करना चाहता था।
जब मालती को बद्रीनाथ के बारे में पता चला, तो उसकी नीयत डगमगा गई। उसने अपने /शराबी/ पति रामदीन को विश्वास में लिया और एक दिन दोनों चुपके से बद्रीनाथ के घर पहुँचे।
बद्रीनाथ के घर बैठकर मालती ने सीधे मुद्दे की बात की, “बद्रीनाथ जी, हमारी बेटी शीला एकदम गाय की तरह सीधी है। घर का सारा काम जानती है और दिखने में भी अप्सरा जैसी है। लेकिन हमारी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है…”
बद्रीनाथ मालती के इस इशारे को तुरंत समझ गया। उसने मुस्कुराते हुए कहा, “मालती जी, अगर लड़की मुझे पसंद आ गई, तो रुपये-पैसे की चिंता आप छोड़ दीजिए। मैं आपको ५ लाख रुपये नकद दूँगा और शादी का पूरा खर्च भी मैं ही उठाऊँगा।”
५ लाख रुपये की मोटी रकम सुनते ही मालती और रामदीन की आँखों में चमक आ गई। मालती के लिए यह एक तीर से दो निशाने साधने जैसा था—एक तो शीला का जीवन एक बूढ़े के साथ बंधकर /नर्क/ बन जाता, और दूसरा उसे बिना कुछ किए ५ लाख रुपये नकद मिल जाते। सौदा पक्का हो गया।
भाग ४: चोरी-छिपे सुनी बातें और पिता की बेरुखी
शादी पक्की होने से कुछ दिन पहले, बद्रीनाथ बात पक्की करने और शीला को देखने के बहाने रामदीन के घर आया। उस समय शीला रसोईघर में चूल्हे पर खाना बना रही थी। बगल वाले कमरे में मालती, रामदीन और बद्रीनाथ बैठकर बातें कर रहे थे।
शीला ने चाय का कप देने के लिए जैसे ही कमरे के दरवाजे के पास कदम रखा, उसके कानों में बद्रीनाथ की भारी और काँपती हुई आवाज़ पड़ी।
“रामदीन जी, यह ५ लाख रुपये का एडवांस आप रखिए। शादी की तारीख अगले महीने की तय करते हैं। बस यह ध्यान रखिएगा कि शीला को इस बात का पता पहले से न चले, वरना वह कोई बखेड़ा न खड़ा कर दे।”
यह सुनते ही शीला के हाथ से चाय की ट्रे छूटते-छूटते बची। उसके पैरों तले की जमीन खिसक गई। वह भागी-भागी रसोई में आई और फूट-फूटकर रोने लगी। जिस बद्रीनाथ को उसने दरवाजे पर देखा था, उसके सिर के सारे बाल सफेद थे, चेहरे पर झुर्रियाँ थीं और वह उसकी दादा की उम्र का लग रहा था। शीला का दिल दहल गया।
जब बद्रीनाथ चला गया, तो मालती रसोई में आई और बड़ी शान से बोली, “देख शीला! तेरी शादी तय कर दी है हमने। अब ज्यादा नखरे मत दिखाना और चुपचाप शादी के लिए तैयार हो जाना।”
शीला मालती के पैरों में गिर पड़ी। वह रो-रोकर गिड़गिड़ाने लगी, “माँ! मुझे किसी कुएँ में धकेल दो, लेकिन उस बूढ़े आदमी से मेरी शादी मत करो! मैं जीवन भर तुम्हारी गुलामी करूँगी, कभी खाने के लिए भी नहीं माँगूँगी, लेकिन मुझे उस बूढ़े के हवाले मत करो!”
मालती ने उसे धक्का देकर परे हटा दिया। तब शीला अपने पिता रामदीन के पास पहुँची, जो उस समय भी /शराब/ के /नशे/ में झूम रहा था। शीला ने पिता के हाथ पकड़ लिए, “पिताजी! आप तो मेरे अपने पिता हैं ना? मेरी सगी माँ नहीं रही, तो क्या आप भी मुझे एक बूढ़े के हाथों /बेच/ देंगे? मुझे बचा लीजिए पिताजी!”
रामदीन ने /नशे/ में धुत होकर अपनी बेटी को डांटते हुए कहा, “मुँह बंद रख अपना! कब तक घर में बैठकर हमारी मुफ्त की रोटियाँ तोड़ेगी? बद्रीनाथ के पास करोड़ों की जायदाद है। वहाँ जाकर तू रानी बनकर रहेगी। नौकर-चाकर तेरी सेवा करेंगे। तुझे तो हमारा शुक्रिया अदा करना चाहिए कि हम तेरी शादी इतने बड़े घर में कर रहे हैं!”
जब पिता के इन /निष्ठुर/ शब्दों को शीला ने सुना, तो उसे समझ आ गया कि उसके अपने पिता ने भी पैसों के लालच में उसे /बेच/ दिया है। उस दिन के बाद से शीला एकदम मौन हो गई। उसने रोना, गिड़गिड़ाना और बोलना सब बंद कर दिया। वह एक ज़िंदा लाश की तरह घर के कोने में पड़ी रहती।
भाग ५: बारात का आगमन और गाँव का आक्रोश
तय तिथि पर बद्रीनाथ बड़ी धूमधाम से बाजे-गाजे के साथ बारात लेकर रामदीन के दरवाजे पर पहुँचा। जब गाँव के लोग दूल्हे को देखने के लिए इकट्ठा हुए, तो वहाँ सन्नाटा पसर गया। ५५-६० साल का बूढ़ा बद्रीनाथ सेहरा सजाए दूल्हे के रूप में बैठा था, और उसके साथ उसके ढलती उम्र के दोस्त बाराती बने हुए थे।
गाँव की महिलाएँ और बुजुर्ग आपस में फुसफुसाने लगे। एक बूढ़ी काकी ने मालती को धिक्कारते हुए कहा, “राम-राम! मालती, तुझे जरा भी शर्म नहीं आई? अपनी ही सौतेली बेटी का ऐसा /सौदा/ करते हुए? यह तो साफ-साफ एक जवान लड़की की बलि चढ़ाना है!”
दूसरी महिला बोली, “सौतेली माँ से और क्या उम्मीद की जा सकती है? पैसे के लालच में उसने बेचारी अनपढ़ शीला की जिंदगी /तबाह/ कर दी। रामदीन भी /शराब/ के चक्कर में अंधा हो गया है।”
गाँव के लोगों में मालती और रामदीन के प्रति भारी थूक-धिक्कार था, लेकिन किसी में भी इतनी हिम्मत नहीं थी कि वे शादी रुकवा पाते, क्योंकि रामदीन ने पुलिस या पंचायत में जाने पर गाँव वालों को ही धमकाया था।
मंडप में शीला को लाया गया। वह लाल जोड़े में लिपटी हुई थी, उसकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे। उसका मन कर रहा था कि वह इसी क्षण दम तोड़ दे। लेकिन /लाचारी/ और /बेबसी/ के उस चक्रव्यूह में वह फँसी रही। पंडित ने मंत्र पढ़े, फेरे हुए, और बद्रीनाथ ने शीला की माँग में सिंदूर भर दिया। इस तरह ५ लाख रुपये के /सौदे/ की यह शादी संपन्न हो गई।
अगले दिन सुबह शीला की विदाई हुई। पूरे गाँव की आँखें नम थीं, सिवाय मालती और रामदीन के, जो पैसों की गड्डी सँभालने में व्यस्त थे।
भाग ६: /दुःस्वप्न/ की रात और साहसी बगावत
विदाई के बाद बद्रीनाथ शीला को अपने विशाल हवेलीनुमा घर ले आया। रात हुई, सुहागरात के लिए कमरे को फूलों से सजाया गया था। जब बद्रीनाथ कमरे में दाखिल हुआ, तो शीला कमरे के एक कोने में सिमटी हुई खड़ी थी। उसके अंदर भय, घृणा और आक्रोश का बवंडर उठ रहा था।
बद्रीनाथ ने मुस्कुराते हुए उसके पास आने की कोशिश की और कहा, “शीला, अब तुम मेरी पत्नी हो। डरो मत, मेरे पास सब कुछ है, मैं तुम्हें बहुत खुश रखूँगा।”
उस रात जो रस्म और /शारीरिक प्रताड़ना/ शीला को सहनी पड़ी, वह उसके लिए किसी /दुःस्वप्न/ से कम नहीं थी। उसने उस रात का एक-एक पल किसी तरह झेला। लेकिन उस अंधेरी रात के बीतने के साथ ही शीला के भीतर की सहमी हुई लड़की मर चुकी थी और एक स्वाभिमानी, निडर स्त्री का जन्म हो चुका था।
अगली सुबह जैसे ही सूरज की पहली किरण खिड़की से अंदर आई, शीला बिस्तर से उठी। उसने अपने आँसू पोंछे और पूरी मजबूती के साथ बद्रीनाथ के सामने जाकर खड़ी हो गई।
बद्रीनाथ ने चौंककर पूछा, “क्या हुआ शीला? इतनी सुबह-सुबह क्या बात है?”
शीला ने अपनी दृढ़ और गंभीर आवाज़ में कहा, “बद्रीनाथ जी, जो /ज़बरदस्ती/ और जो /पाप/ आपको मेरे साथ करना था, वह आपने रात में कर लिया। मेरे माँ-बाप ने मुझे ५ लाख रुपये में आपके हाथों /बेच/ दिया था, इसलिए आपने मुझे खरीद लिया। लेकिन मेरी आत्मा को आप कभी नहीं खरीद सकते। आज और अभी, मैं इस घर को छोड़कर जा रही हूँ। अब मैं एक पल भी आपके साथ नहीं रहूँगी!”
बद्रीनाथ के होश उड़ गए। उसने चिल्लाकर कहा, “तुम्हारी यह हिम्मत! मैंने तुम्हारे बाप को ५ लाख रुपये दिए हैं!”
“वह ५ लाख रुपये आपने मेरे बाप को दिए थे, मुझे नहीं! आपको अपने पैसे चाहिए, तो मेरे बाप से वसूल कीजिए। लेकिन मैं आपके पास अब दोबारा कभी लौटकर नहीं आऊँगी!” इतना कहकर, शीला बिना कोई सामान लिए, उसी लाल जोड़े और दुल्हन के वेश में हवेली के मुख्य दरवाजे से बाहर निकल गई।
बद्रीनाथ घबरा गया। उसने तुरंत मालती को फोन मिलाया, “मालती! तुम्हारी बेटी तो पागल है! वह सुबह-सुबह घर से भाग गई है! उसे रोको, वरना अपने ५ लाख रुपये तुरंत वापस करो!”
फोन पर यह बात सुनकर मालती ने अपने पति रामदीन को बताया। लेकिन रामदीन ने /शराब/ का घूँट भरते हुए बेपरवाही से कहा, “अरे छोड़ो भी! हमें तो हमारे ५ लाख रुपये मिल गए ना? अब शीला जहाँ मर्जी जाए, जिए या मरे, हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं है। बद्रीनाथ समझे और शीला समझे।” मालती ने भी हँसकर फोन काट दिया और पैसों की गिनती करने लगी।
भाग ७: दिल्ली स्टेशन पर भटकती दुल्हन
घर से निकलकर शीला बस में बैठी और सीधे पास के रेलवे स्टेशन पहुँची। उसके पास थोड़े से पैसे थे जो उसने कभी बचाकर रखे थे। उसने बिना सोचे-समझे जो पहली ट्रेन मिली, उसमें चढ़ गई। वह ट्रेन दिल्ली जा रही थी।
लगभग १०-१२ घंटे के सफर के बाद ट्रेन दिल्ली के विशाल आनंद विहार रेलवे स्टेशन पर पहुँची। हजारों-लाखों लोगों की भीड़, गाड़ियों का शोर और अजनबी शहर का माहौल देखकर अनपढ़ शीला पूरी तरह घबरा गई। उसके पास न तो खाने के लिए एक रुपया बचा था और न ही रहने का कोई ठिकाना।
वह स्टेशन के प्लेटफ़ॉर्म नंबर ३ पर बनी एक सीमेंट की बेंच पर बैठ गई। उसके सिर पर लाल चुन्नी थी, हाथों में शादी का लाल चूड़ा था और चेहरे पर असीम थकान व /लाचारी/ साफ़ झलक रही थी। वह भूखी-प्यासी, सिर झुकाए रो रही थी। आने जाने वाले लोग उसे घूर रहे थे। कुछ लोग दबी ज़बान में बातें कर रहे थे कि शायद यह लड़की शादी के मंडप से भागकर आई है।
शीला सोच रही थी कि अब उसका क्या होगा? क्या वह इस अजनबी शहर में /भूख/ से मर जाएगी? या फिर कोई /दुष्ट/ इंसान उसे अपनी /हवस/ का शिकार बना लेगा? मौत का डर और जीवन की निराशा उसके मन में घर कर रही थी।
भाग ८: उम्मीद की किरण—रमेश से मुलाकात
उसी समय, प्लेटफ़ॉर्म पर एक २५-२६ वर्षीय नवयुवक अपना बैग लटकाए टहल रहा था। उसका नाम रमेश था। रमेश मूल रूप से बिहार के समस्तीपुर जिले के एक सुंदर से गाँव का रहने वाला था। वह दिल्ली में एक प्राइवेट कंपनी में छोटी-मोटी नौकरी करता था और उस दिन अपने गाँव जाने के लिए ट्रेन का इंतजार कर रहा था।
रमेश की नज़र पिछले दो घंटे से उस लाल जोड़े में बैठी अकेली लड़की पर थी। उसने देखा कि कई आवारा किस्म के लोग उस लड़की के आसपास चक्कर काट रहे थे और वह लड़की बेबस होकर काँप रही थी।
रमेश एक संस्कारी, ईमानदार और संवेदनशील युवक था। उससे उस लड़की की /लाचारी/ देखी नहीं गई। वह हिम्मत करके शीला के पास पहुँचा और बहुत ही आदर से बोला, “बहन… माफ करना, मैं काफी देर से देख रहा हूँ कि आप यहाँ अकेली बैठी रो रही हैं। क्या बात है? क्या आपकी ट्रेन छूट गई है या आप किसी परेशानी में हैं?”
शीला ने डरते-डरते ऊपर देखा। रमेश के चेहरे पर कोई /खोट/ या /वासना/ नहीं थी, बल्कि एक सच्चे इंसान की हमदर्दी और चिंता थी।
शीला फिर अपने आँसू नहीं रोक पाई। उसने रोते-रोते हिचकियों के बीच अपनी पूरी दास्तान सुना दी—अपनी सगी माँ का जाना, पिता का /शराबी/ होना, सौतेली माँ का /अत्याचार/, ५ लाख में बूढ़े बद्रीनाथ से /सौदा/, सुहागरात का /दुःस्वप्न/ और फिर वहाँ से भागकर दिल्ली आने की कहानी।
शीला की दुखभरी दास्तान सुनकर रमेश का कलेजा मुँह को आ गया। उसकी आँखों में पानी आ गया। उसने सोचा कि इस मतलबी दुनिया में मासूम लोगों पर कितना /अत्याचार/ होता है।
रमेश ने बिना कोई देरी किए पहले शीला को स्टेशन के पास के एक साफ-सुथरे रेस्तरां में ले जाकर भरपेट खाना खिलाया और पानी पिलाया। जब शीला के चेहरे पर थोड़ा होश आया, तो रमेश ने उससे कहा, “शीला जी, आप अनपढ़ हैं और इस बड़े शहर दिल्ली में अकेले रहना आपके लिए बहुत खतरनाक है। यहाँ कदम-कदम पर /दरिंदे/ बैठे हैं।”
शीला ने रोते हुए कहा, “तो मैं कहाँ जाऊँ भाई? मेरे अपने घर वालों ने तो मुझे /बेच/ दिया। अब मेरा इस दुनिया में कोई नहीं है।”
रमेश ने कुछ देर विचार किया। उसका दिल पिघल चुका था। उसने शीला की आँखों में आँखें डालकर पूरी सच्चाई और पवित्रता के साथ कहा, “शीला, मैं बिहार का रहने वाला हूँ। मेरे घर में मेरी बूढ़ी माँ है। मैं अभी तक कुँवारा हूँ। अगर आपको मुझ पर थोड़ा सा भी भरोसा हो, तो क्या आप मेरे साथ मेरे गाँव चलेंगी? मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि मैं आपको पूरा सम्मान दूँगा। मेरी माँ भी बहुत दयालु हैं, वे आपको अपनी बेटी की तरह रखेंगी।”
शीला ने रमेश की आँखों में देखा। उसे उन आँखों में सच्चाई, सुरक्षा और सम्मान का अहसास हुआ। उसने सिर हिलाकर हाँ कर दी।
भाग ९: बिहार का सफर और नए जीवन का प्रादुर्भाव
रमेश ने अपनी गाँव जाने वाली ट्रेन के दो टिकट लिए और शीला को लेकर अपने गाँव समस्तीपुर की ओर रवाना हो गया। लगभग २४ घंटे के लंबे रेल सफर के दौरान रमेश ने शीला का एक बड़े भाई और रक्षक की तरह ख्याल रखा। उसने शीला को चाय, नाश्ता और खाना समय पर दिया और खुद पूरी रात जागकर उसकी सुरक्षा की।
अगले दिन शाम को दोनों रमेश के गाँव पहुँचे। जब गाँव के लोगों ने रमेश को एक नई-नवेली सुंदर दुल्हन जैसी लड़की के साथ आते देखा, तो गाँव में चर्चाओं का बाज़ार गर्म हो गया। लोग कहने लगे, “अरे! रमेश तो दिल्ली कमाने गया था, लेकिन वहाँ से इतनी सुंदर बहुरिया ले आया!”
रमेश शीला को लेकर सीधे अपने घर पहुँचा। उसकी माँ दरवाज़े पर ही खड़ी थी। जब उन्होंने रमेश के साथ दुल्हन के वेश में एक अंजान लड़की को देखा, तो वे भौचक्की रह गईं।
“रमेश! यह कौन है बेटा? और यह इस हालत में तेरे साथ क्यों आई है?” माँ ने आश्चर्य से पूछा।
रमेश ने अपनी माँ को कमरे में ले जाकर शीला की दुखभरी कहानी की एक-एक बात सच-सच बता दी। उसने माँ से कहा, “माँ! अगर मैं इसे दिल्ली स्टेशन पर छोड़ आता, तो कोई /दुष्ट/ इसकी जिंदगी /बरबाद/ कर देता। इसके अपनों ने ही इसे /बेच/ दिया था। माँ, क्या हम इसे अपने घर में आश्रय नहीं दे सकते?”
रमेश की माँ एक अत्यंत धार्मिक और ममतामयी स्त्री थीं। शीला की /प्रताड़ना/ की कहानी सुनकर उनकी आँखें भर आई। उन्होंने बाहर आकर शीला को अपने गले से लगा लिया और कहा, “बेटी! आज से तू अनाथ नहीं है। यह तेरा अपना घर है और मैं तेरी माँ हूँ।”
शीला अपनी नई माँ की गोद में सिर रखकर फूट-फूटकर रोई। इतने सालों बाद उसे किसी माँ की ममता की सोंधी खुशबू महसूस हुई थी।
भाग १०: मन्दिर की सौगंध और २ साल बाद का सुखद सवेरा
गाँव के प्रतिष्ठित लोगों और पंचायत की मौजूदगी में, रमेश और शीला ने गाँव के प्राचीन शिव मंदिर में जाकर एक-दूसरे को वरमाला पहनाई। रमेश ने शीला की माँग में पवित्र सिंदूर भरा और जीवन भर उसकी रक्षा करने, उसे सम्मान देने की कसम खाई। यह शादी किसी पैसों के /सौदे/ पर नहीं, बल्कि दो पवित्र आत्माओं के प्रेम, सम्मान और विश्वास पर आधारित थी।
देखते ही देखते २ साल का लंबा समय बीत गया।
शीला का जीवन अब पूरी तरह बदल चुका था। जो लड़की कभी /बासी/ रोटियों के लिए तरसती थी, अपने ही घर में नौकरानी की तरह पिसती थी, आज वह अपने नए घर की अन्नपूर्णा और गृहलक्ष्मी थी। उसकी सास उसे अपनी सगी बेटी से भी ज्यादा प्यार करती थी। रमेश ने दिल्ली की नौकरी छोड़कर गाँव में ही खेती-बाड़ी और अपना एक छोटा सा व्यापार शुरू कर दिया था, ताकि वह अपनी पत्नी और माँ के साथ रह सके।
इन २ वर्षों में ईश्वर ने उन्हें एक सुंदर और स्वस्थ पुत्र की सौगात भी दी। आज शीला का घर बच्चे की किलकारियों से गूँज रहा था। शीला सुबह-सुबह उठकर खेत में रमेश के लिए गरम-गरम खाना लेकर जाती, अपनी सास के पैर दबाती और अपने बच्चे को दुलारती।
उधर, दूसरी तरफ, शीला के पुराने गाँव में उसकी सौतेली माँ मालती और पिता रामदीन का क्या हाल हुआ? बद्रीनाथ ने पुलिस और पंचायत के जरिए रामदीन से अपने ५ लाख रुपये वापस छीन लिए। रामदीन अत्यधिक /शराब/ पीने के कारण गंभीर बीमारी का शिकार हो गया और पाई-पाई को तरसने लगा। मालती के सारे घमंड और रूप-रंग की चमक गायब हो गई। पैसों के लालच में उन्होंने जिस बेटी को /बेच/ दिया था, उसी बेटी के जाने के बाद उनका घर पूरी तरह /बर्बाद/ हो गया।
लेकिन शीला ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उसने अपने अतीत के /अंधेरे/ को पीछे छोड़ दिया था। रमेश के निश्छल प्रेम, सास की ममता और अपने बच्चे की मुस्कान ने शीला के जीवन के हर घाव को भर दिया था।
निष्कर्ष और सामाजिक सीख
यह कहानी समाज के मुँह पर एक जोरदार तमाचा है जो आज भी बेटियों को बोझ समझते हैं या पैसों के लालच में उनका /सौदा/ कर देते हैं।
१. सौतेलेपन का /क्रूर/ चेहरा: मालती जैसी स्वार्थी सौतेली माएँ और रामदीन जैसे /शराबी/ पिता समाज के लिए /कलंक/ हैं, जो अपनी ही संतानों की खुशियों की बलि चढ़ा देते हैं। २. स्त्री का साहस: शीला ने यह साबित किया कि अगर किसी स्त्री पर /अत्याचार/ हो, तो उसे चुपचाप सहने के बजाय अपनी आवाज़ उठानी चाहिए और /प्रताड़ना/ के उस बंधन को तोड़कर बाहर निकलना चाहिए। ३. सच्ची मानवता: रमेश और उसकी माँ का चरित्र यह सिखाता है कि दुनिया में आज भी इंसानियत और दया ज़िंदा है। किसी /बेबस/ को सहारा देना और उसे सम्मान देना ही ईश्वर की सबसे बड़ी पूजा है।
शीला का नया जीवन इस बात का प्रतीक है कि रात चाहे कितनी भी घनी और काली क्यों न हो, अगर मन में सच्चाई और हिम्मत हो, तो सुबह का नया सवेरा अवश्य आता है।