बहु की मजबूरी का फायदा उठाया ससुर ने।
बहु की मजबूरी का फायदा उठाया ससुर ने: एक दर्दनाक पारिवारिक दास्तान
अध्याय 1: अमृतसर की शांत गलियाँ और एक अधूरा परिवार
पंजाब का ऐतिहासिक और पवित्र शहर अमृतसर। शहर के शोर-शराबे से कुछ ही दूरी पर बसा एक शांत, हरा-भरा गाँव। चारों तरफ लहलहाते सरसों और गेहूं के खेत, सुबह-सुबह गुरुद्वारे से आती गुरबाणी की मीठी ध्वनियाँ और कच्ची-पक्की सड़कों पर दौड़ते ट्रैक्टर। इसी गाँव के एक मुहाने पर बना था रामकिशोर का दो मंज़िला पक्का मकान। देखने में यह मकान बहुत खुशहाल और संपन्न लगता था, लेकिन इसकी चारदीवारी के अंदर सन्नाटे का एक ऐसा गहरा कुआँ था जिसमें सिर्फ उदासी और अकेलापन तैरता रहता था।
इस घर में कुल जमा तीन लोग रहते थे।
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रामकिशोर: उम्र लगभग 60 वर्ष। चेहरे पर गहरी झुर्रियां, सफेद मूंछें और आँखों में जीवन के अनुभवों की कड़वाहट। रामकिशोर की पत्नी का देहांत कई साल पहले एक बीमारी के कारण हो चुका था। तब से वे अकेले ही घर और थोड़ी बहुत खेती-बाड़ी की देखरेख करते थे।
सविता: उम्र लगभग 30 वर्ष। रामकिशोर की छोटी बहु। सविता एक अत्यंत सुंदर, सुघड़ और शांत स्वभाव की महिला थी। वह पारंपरिक पंजाबी और देहाती संस्कारों में पली-बढ़ी थी, लेकिन उसकी आँखों में एक अनकही प्यास और अकेलेपन की परछाईं हमेशा बनी रहती थी।
छोटी सी बच्ची (पिंकी): उम्र लगभग 4 साल। सविता और उसके पति की इकलौती संतान, जो अभी तोतली भाषा में बोलती थी और पूरे घर में अपनी पायल छनकाती घूमती थी।
इस परिवार का चौथा सदस्य था मुकेश, जो सविता का पति और रामकिशोर का इकलौता बेटा था। मुकेश की उम्र लगभग 35 वर्ष थी। गाँव में खेती से इतनी आमदनी नहीं होती थी कि पूरे परिवार का खर्च और भविष्य की बचत आसानी से हो सके, इसलिए मुकेश दिल्ली की एक निजी फ़ैक्टरी में सुपरवाइज़र की नौकरी करता था।
मुकेश हर चार-पांच महीने में एक बार गाँव आता था, हफ़्ते-दस दिन रहता और फिर वापस दिल्ली चला जाता। घर में बूढ़े पिता थे, इसलिए मुकेश निश्चिंत रहता था कि उसकी पत्नी और मासूम बच्ची की सुरक्षा के लिए घर में एक अभिभावक मौजूद है। लेकिन मुकेश यह भूल गया था कि जवानी के पड़ाव पर खड़ी एक औरत के लिए सिर्फ छत और रोटी ही सब कुछ नहीं होती; उसके अंदर भी भावनात्मक और शा//रीरिक ज़रूरतें होती हैं, जो पति की गैरमौजूदगी में तिल-तिल कर घुटती रहती हैं।
सविता का दिन तो घर के चूल्हे-चौके, झाड़ू-पोछे, मवेशियों को चारा देने और पिंकी की देखभाल में कट जाता था। लेकिन जैसे ही सूरज ढलता, गाँव पर सन्नाटा छा जाता और गाँव के लोग अपने-अपने घरों के किवाड़ बंद कर लेते, सविता के लिए असली परीक्षा शुरू होती थी।
अध्याय 2: रातों का सन्नाटा और इंटरनेट का मायाजाल
रात के नौ बजते ही रामकिशोर खाना खाकर अपने बाहर वाले कमरे में सोने चले जाते थे। पिंकी भी दूध पीकर सविता के बगल में सो जाती थी। पूरे कमरे में सिर्फ़ पंखे की ‘गड़-गड़’ आवाज़ गूंजती थी। सविता अपने बिस्तर पर करवटें बदलती रहती।
मुकेश अक्सर रात को दस बजे के आसपास दिल्ली से फ़ोन करता था। “हाँ सविता, खाना खा लिया?” मुकेश फ़ोन पर पूछता। “हाँ, खा लिया। तुमने खाया?” सविता धीमी आवाज़ में जवाब देती। “हाँ, ढाबे पर खा लिया था। पिंकी सो गई?” “हाँ, वो तो नौ बजे ही सो गई थी। तुम कब आ रहे हो गाँव?” सविता के स्वर में एक आस होती। “अभी तो काम बहुत ज़्यादा है सविता। सेठ ने छुट्टी देने से मना कर दिया है। दो-तीन महीने बाद आऊँगा। तुम अपना और बापू का ध्यान रखना।”
दस मिनट की औपचारिक बातों के बाद फ़ोन कट जाता। फ़ोन कटते ही सविता का दिल और भारी हो जाता। जिस पति के साथ उसे रातें बितानी थीं, वह सैकड़ों किलोमीटर दूर किसी कमरे में सोया था।
इसी अकेलेपन के बीच सविता के हाथ में आया एक आधुनिक स्मार्टफोन। मुकेश ने ही उसे यह फ़ोन दिया था ताकि वह वीडियो कॉल पर बात कर सके और समय बिता सके। लेकिन इंटरनेट एक ऐसा अथाः समंदर है जहाँ इंसान भटक जाए तो किनारे पर वापस आना मुश्किल हो जाता है।
एक दिन यूट्यूब और सोशल मीडिया पर रैंडम स्क्रॉल करते-करते सविता को कुछ ऐसी वेबसाइट्स और गं//दी लिंक्स की जानकारी मिली जहाँ अ//श्लील और उत्ते//जक वीडियो दिखाए जाते थे। शुरुआत में सविता ने झिझक के साथ उन वीडियो को देखा। उसे डर लग रहा था कि कोई देख न ले, लेकिन कमरे में पसरे सन्नाटे और उसके अंदर धधकती जवानी ने डर को दबा दिया।
धीरे-धीरे यह उसकी रोज़ की ल//त बन गई।
रात को जैसे ही सब सो जाते, सविता अपने कान में इयरफोन लगा लेती।
मोबाइल की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ती और वह घंटों तक उन गं//दी और काम//ुक वीडियो को देखती रहती।
वीडियो देखते-देखते उसके शरीर में उत्ते//जना का बवंडर उठने लगता।
वह अपने ही हाथों से अपने शरीर को सहलाने लगती और अपनी शा//रीरिक भूख को शांत करने का असफल प्रयास करती।
लेकिन जब इंसान किसी गलत ल//त में पड़ता है, तो उसका विवेक और सोचने-समझने की क्षमता क्षीण होने लगती है। सविता को भी अंदाज़ा नहीं था कि इंटरनेट की यह अ//श्लील दुनिया उसे किस भयानक दलदल में धकेलने वाली है।
अध्याय 3: एक शाम की सब्जी और अनहोनी दुर्घटना
समय बीतता रहा। रामकिशोर रोज़ की तरह गाँव के बाज़ार जाते, घर का राशन और सब्ज़ियाँ लाते। एक दिन शाम को रामकिशोर बाज़ार से लौटे। उनके हाथ में सब्ज़ियों का एक बड़ा थैला था।
“बहू! ओ बहू!” रामकिशोर ने बाहर के आंगन से आवाज़ लगाई। सविता रसोई से बाहर आई, “जी बापू जी?” “ये बाज़ार से सब्ज़ियाँ लाया हूँ। आज ताज़ा बैं//गन मिले थे, तो ले आया। कल सुबह बैं//गन की कलौंजी और भर्ता बना लेना, मेरा बहुत मन कर रहा है,” रामकिशोर ने थैला सविता की तरफ बढ़ाते हुए कहा।
सविता ने थैला हाथ में लिया। उसमें गहरे बैंगनी रंग के, लंबे और सख्त किस्म के बैं//गन रखे थे। “ठीक है बापू जी, कल सुबह नाश्ते में कलौंजी ही बना दूंगी,” सविता ने कहा और थैला लेकर रसोई में चली गई। उसने सारे बैं//गन धोकर फ्रिज के निचले हिस्से में रख दिए।
उस रात भी हमेशा की तरह सारा काम निपटाकर सविता अपने कमरे में चली गई। रात के लगभग 11 बजे मुकेश का फ़ोन आया। बात हुई और फ़ोन कट गया। हमेशा की तरह सविता ने अपना मोबाइल उठाया और अ//श्लील वीडियो देखना शुरू कर दिया।
उस रात जो वीडियो वह देख रही थी, वह बेहद उग्र और उत्ते//जक था। उस वीडियो को देखकर सविता का आपा खोने लगा। उसके शरीर में काम//वासना का ऐसा ज़हर फैला कि उसका रोआँ-रोआँ तड़पने लगा। वह बिस्तर पर छटपटाने लगी। उसने खुद को शांत करने की कोशिश की, लेकिन उत्ते//जना काबू से बाहर हो चुकी थी।
उसकी नज़र कमरे के कोने में रखी फ्रिज पर गई। अचानक उसके शैतानी दिमाग में एक बेहद गं//दा और ख़तरनाक विचार आया। उसने सोचा कि घर में कोई कृत्रिम चीज़ तो है नहीं, क्यों न फ्रिज में रखे उस लंबे बैं//गन का इस्तेमाल किया जाए?
वासना में अंधी हो चुकी सविता दबे पाँव उठी, रसोई में गई और फ्रिज खोलकर एक लंबा, सख्त बैं//गन निकाल लाई। उसने दरवाज़ा अंदर से हल्का सा सटा दिया और वापस बिस्तर पर आ गई।
उसने उस बैं//गन का इस्तेमाल अपनी शा//रीरिक उत्ते//जना को शांत करने के लिए एक औज़ार की तरह करना शुरू कर दिया। अत्यधिक काम//ुकता और बेकाबू उत्ते//जना के कारण वह यह भूल गई कि वह एक कच्ची सब्जी है। वह पूरी ताक़त और लापरवाही से गं//दी हरकतें करती रही।
और तभी… एक भयानक दुर्घटना घटी!
अत्यधिक दबाव और गलत कोण के कारण वह सख्त बैं//गन अचानक बीच में से कड़ाक की आवाज़ के साथ टूट गया!
उस बैं//गन का एक बड़ा और मोटा टुकड़ा सविता के गुप्त//ांग के बेहद अंदर गहराई में जाकर फंस गया!
सविता के मुंह से एक चीख निकलते-निकलते रह गई। उसने तुरंत अपना हाथ मुंह पर रख लिया ताकि बापू जी या बच्ची जाग न जाएँ। भयानक दर्द की एक लहर उसके पूरे शरीर में दौड़ गई।
सविता घबरा गई। उसने तुरंत उस टुकड़े को बाहर निकालने की कोशिश की। उसने उंगलियों से पकड़कर खींचने का प्रयास किया, लेकिन दर्द इतना असहनीय था कि उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। टुकड़ा इतना अंदर जा चुका था कि उंगलियों की पकड़ में ही नहीं आ रहा था। वह जितना प्रयास करती, वह टुकड़ा और अंदर धंसता चला जाता।
पूरी रात सविता बिस्तर पर तड़पती रही। न वह सो सकी, न रो सकी और न ही किसी को बुला सकी। शर्म, खौफ और असहनीय दर्द के बीच उसकी वह रात कयामत की रात बन गई।
अध्याय 4: दर्द का तांडव और पड़ोसी महिला का प्रवेश
अगली सुबह जब सूरज उगा, तो सविता की हालत बेहद ख़राब हो चुकी थी। उसके चेहरे की रंगत उड़ चुकी थी, आँखें लाल थीं और पेट के निचले हिस्से में ऐसा मीठा-मीठा लेकिन भयानक दर्द हो रहा था जैसे अंदर कोई छुरी घोंप रहा हो।
वह किसी तरह हिम्मत जुटाकर उठी। उसने सोचा था कि पेशाब करते वक्त या थोड़ा ज़ोर लगाने पर वह टुकड़ा अपने आप बाहर निकल जाएगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। अंदर की संवेदनशील त्वचा में सूजन आने लगी थी और दर्द बढ़ता ही जा रहा था।
रामकिशोर ने सुबह उठकर देखा कि बहू का चेहरा पीला पड़ा हुआ है और वह ठीक से चल भी नहीं पा रही है। “क्या हुआ बहू? तबीयत ठीक नहीं है क्या?” रामकिशोर ने पूछा। सविता ने नज़रें झुकाकर झूठ बोल दिया, “जी बापू जी, बस पेट में थोड़ा दर्द है और ऐंठन हो रही है। ठीक हो जाएगा।”
पूरा दिन बीत गया। सविता ने किसी तरह रेंग-रेंगकर घर का खाना बनाया। लेकिन शाम होते-होते दर्द इतना बढ़ गया कि सविता से खड़ा होना भी दूभर हो गया। अंदर ज़हरीला असर शुरू हो चुका था। वह समझ गई कि अगर यह चीज़ बाहर नहीं निकली, तो उसकी जान पर बन आएगी। लेकिन वह यह बात अपने ससुर या पति को कैसे बताती? यह बात बताने का मतलब था अपनी इज़्ज़त की खुद धज्जियाँ उड़ाना।
हारकर सविता ने अपनी एक करीबी पड़ोसी महिला ‘सुमन’ को याद किया। सुमन उम्र में सविता से थोड़ी बड़ी थी और सविता का उसके घर काफी उठना-बैठना था। सविता ने किसी तरह सुमन को अपने घर बुलाया और उसे अपने कमरे में ले गई।
सविता फूट-फूट कर रोने लगी। “क्या हुआ सविता? तू ऐसे रो क्यों रही है? क्या बात है?” सुमन ने घबराकर पूछा।
सविता ने शर्म से अपनी आँखें बंद कर लीं और रोते-बिलखते हुए पूरी सच्चाई सुमन को बता दी। उसने बताया कि कैसे रात को उसने बैं//गन के साथ गं//दी हरकत की और वह अंदर टूटकर फंस गया।
सुमन यह सुनकर हक्की-बक्की रह गई। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। “तू पागल हो गई थी क्या सविता?! ये क्या कर बैठी तू?! अगर ये बात गाँव में किसी को पता चल गई तो कहीं मुंह दिखाने के लायक नहीं रहेगी!” सुमन ने फुसफुसाते हुए डांट लगाई।
“दीदी, मुझे बचा लो! मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। दर्द के मारे मेरी जान निकल रही है,” सविता सुमन के पैर पकड़कर रोने लगी।
सुमन ने स्थिति की गंभीरता को समझा। “देख सविता, अभी तो बहुत रात हो चुकी है। इस समय गाँव में कोई डॉक्टर नहीं मिलेगा। तू आज रात किसी तरह बर्दाश्त कर। कल सुबह मैं तुझे शहर के सरकारी अस्पताल ले जाऊंगी। वहाँ मेरी पहचान की एक महिला डॉक्टर (गायनेकोलॉजिस्ट) है, वही तुझे इस मुसीबत से निकाल सकती है।”
अध्याय 5: सरकारी अस्पताल और डॉक्टर की चेतावनी
पूरी रात सविता ने दर्द से कराहते हुए बिताई। उसकी देह बुखार से तपने लगी थी। अंदर फंसा सब्जी का टुकड़ा अब शरीर की गर्मी और नमी के कारण सड़ने (decomposition) लगा था, जिससे संक्रमण फैल रहा था।
अगली सुबह सुमन समय पर आ गई। सविता ने अपने ससुर रामकिशोर से बहाना बनाया, “बापू जी, मेरी तबीयत बहुत ख़राब है। पेट में बहुत तेज़ इंफेक्शन हो गया है। मैं सुमन दीदी के साथ शहर के सरकारी अस्पताल जाकर डॉक्टर को दिखाकर आती हूँ।”
रामकिशोर ने सीधे-सादे अंदाज़ में कहा, “हाँ-हाँ बहू, चली जा। सेहत से बढ़कर कुछ नहीं है। सुमन, ज़रा ध्यान रखना इसका।”
दोनों महिलाएँ बस पकड़कर शहर के सरकारी अस्पताल पहुँचीं। सुमन सविता को सीधे महिला वार्ड में ले गई और अपनी परिचित महिला डॉक्टर से मिली। डॉक्टर ने सविता को प्राइवेट कंसल्टेशन रूम में ले जाकर जब जांच (examination) की, तो वे भी हैरान रह गईं।
डॉक्टर ने बेहद सख्त लहजे में सविता को डांटा, “तुम एक पढ़ी-लिखी और शादीशुदा औरत हो! तुम्हें ज़रा सा भी होश नहीं था कि तुम अपने शरीर के साथ क्या खिलवाड़ कर रही हो? अंदर पूरी तरह से सूजन आ चुकी है और वह टुकड़ा सड़ना शुरू हो चुका है!”
सविता सिर्फ रोती रही और अपनी जान की भीख मांगती रही।
डॉक्टर ने बिना देर किए लोकल एनेस्थीसिया देकर विशेष चिकित्सकीय उपकरणों (medical forceps) की मदद से बेहद सावधानी से उस सड़े हुए बैं//गन के टुकड़े को बाहर निकाला। जब वह टुकड़ा बाहर निकला, तो उसमें से भयंकर दुर्गंध आ रही थी।
डॉक्टर ने घाव को साफ किया, एंटीसेप्टिक से धोया और तेज़ एंटीबायोटिक्स व दर्द निवारक दवाइयाँ लिखीं।
डॉक्टर ने गंभीर आवाज़ में कहा, “सविता, तुम बहुत खुशनसीब हो कि आज आ गईं। अगर 24 घंटे की देरी और हो जाती, तो यह संक्रमण (Sepsis) तुम्हारे गर्भाशय और खून में फैल जाता। फिर तुम्हारी जान बचाना नामुमकिन हो जाता। अगले एक हफ्ते तक भारी काम मत करना और ये दवाइयाँ समय पर लेना।”
सविता ने राहत की सांस ली। उसे लगा कि उसकी जान बच गई और उसकी खौफनाक गलती का राज़ भी हमेशा के लिए अस्पताल की दीवारों में दफन हो गया। लेकिन वह गलत थी। असली बवंडर तो अभी उसके घर पर इंतज़ार कर रहा था।
अध्याय 6: दबी जुबान का ज़हर और ससुर तक पहुँची खबर
कहते हैं कि औरत के पेट में बात और हवा में उड़ती राख कभी छुप नहीं सकती। सुमन ने सविता की जान तो बचा ली थी, लेकिन इतनी बड़ी और चटपटी ‘खबर’ अपने पेट में पचाना उसके लिए असंभव साबित हुआ।
उस रात सुमन जब घर लौटी, तो उसका पति ‘हरनाम’ खाना खा रहा था। सुमन के चेहरे पर अजीब सी छटपटाहट थी। “क्या बात है सुमन? आज बड़ी परेशान दिख रही है?” हरनाम ने पूछा।
सुमन ने इधर-उधर देखा, कमरे का दरवाज़ा बंद किया और अपने पति के पास जाकर फुसफुसाकर बोली, “सुनो जी, एक ऐसी बात पता चली है कि सुनोगे तो तुम्हारे होश उड़ जाएंगे!” “ऐसी क्या बात है?” हरनाम की उत्सुकता बढ़ी।
सुमन ने रामकिशोर की बहू सविता के अस्पताल जाने का पूरा ‘कांड’ नमक-मिर्च लगाकर अपने पति को सुना दिया। “बताओ जी! इतनी सीधी बनती थी और रात को बैं//गन के साथ गं//द मचा रही थी! अस्पताल में डॉक्टर ने निकाला है!”
हरनाम भी यह सुनकर दंग रह गया। अगली सुबह हरनाम गाँव के मोड़ पर चाय की दुकान पर बैठा था। वहाँ रामकिशोर भी अपने कुछ बुजुर्ग दोस्तों के साथ ताश खेल रहे थे।
जब रामकिशोर वहाँ से उठकर अपने खेत की तरफ जाने लगे, तो हरनाम उनके पीछे-पीछे गया और उन्हें एकांत में ले गया।
“रामकिशोर चाचा! ज़रा बात सुनो,” हरनाम ने धीमी आवाज़ में कहा। “हाँ हरनाम, क्या बात है?” रामकिशोर ने पूछा।
“चाचा, मैं तुमसे एक बात कहना चाहता हूँ, लेकिन वादा करो कि गुस्सा नहीं करोगे और अपने बेटे मुकेश को तुरंत दिल्ली से वापस बुला लोगे।” रामकिशोर चौंक गए, “मुकेश को क्यों बुला लूँ? वो तो अभी एक महीने पहले ही आकर गया है। चार-पांच महीने बाद आएगा। आख़िर बात क्या है हरनाम? खुलकर बता!”
हरनाम ने इधर-उधर देखा और बोला, “चाचा, तुम्हारी बहू सविता पर नज़र रखो। परसों जो वो अस्पताल गई थी, तुम्हें क्या लगता है उसे पेट दर्द था? चाचा, तुम्हारी बहू रात को गं//दी वीडियो देखकर बैं//गन के साथ घिनौना काम कर रही थी और वो उसके अंदर टूट गया था! मेरी घरवाली उसे अस्पताल ले गई थी और डॉक्टर ने निकाला है! गाँव में बात फैलने से पहले अपने बेटे को बुला लो, वरना तुम्हारी इज़्ज़त का कबाड़ा हो जाएगा!”
यह सुनना था कि रामकिशोर के पैरों तले से ज़मीन खिसक गई! उनके हाथ से लाठी छूटते-छूटते बची। उनके चेहरे का रंग सफेद पड़ गया।
“क्या… क्या बकवास कर रहा है हरनाम?! मेरी बहू ऐसी नहीं है!” रामकिशोर हकलाए। “चाचा, झूठ बोलना होता तो अपनी घरवाली का नाम क्यों लेता? जाकर अपनी बहू से पूछ लो, सच सामने आ जाएगा,” इतना कहकर हरनाम वहाँ से चला गया।
रामकिशोर सन्न खड़े रहे। उनके दिमाग में तूफ़ान उठने लगा। एक तरफ तो उन्हें अपनी बहू पर भयंकर गुस्सा और घिन आ रही थी, लेकिन दूसरी तरफ… उनके अंदर सोई हुई हवस ने करवट ली।
रामकिशोर खुद पिछले सात-आठ सालों से अकेले (विधुर) थे। उन्होंने अपनी शा//रीरिक इच्छाओं को दबाकर रखा था। जब उन्हें पता चला कि उनकी बहू इतनी काम//ुक और भूखी है कि वह ऐसी हरकतें कर सकती है, तो उनके बूढ़े शरीर में पाप का कीड़ा कुलबुलाने लगा।
अध्याय 7: ससुर का ब्लैकमेल और आधी रात का समझौता
रामकिशोर भारी कदमों से घर पहुँचे। घर में सविता रसोई में चाय बना रही थी। उसके चेहरे पर अभी भी बीमारी की थकावट थी।
रामकिशोर रसोई के दरवाज़े पर आकर खड़े हो गए। उनकी आँखों में आज हमेशा जैसी वात्सल्य की भावना नहीं थी; बल्कि उनमें एक भूखे भेड़िया जैसी गं//दी चमक थी।
“बहू!” रामकिशोर की कड़क आवाज़ गूंजी। सविता ने मुड़कर देखा, “जी बापू जी? चाय लाऊँ?”
“चाय छोड़। मुझे यह बता कि तू परसों अस्पताल क्यों गई थी?” रामकिशोर ने सीधे उसकी आँखों में आँखें डालकर पूछा।
सविता का दिल धड़कना भूल गया। उसके हाथ से चाय की छलनी गिर पड़ी। “ब… बापू जी… वो तो पेट में दर्द…” सविता हकलाने लगी।
“झूठ मत बोल सविता!” रामकिशोर ने आवाज़ थोड़ी ऊँची की। “हरनाम ने मुझे सब सच बता दिया है! तेरी करतूत अस्पताल से लेकर पूरे गाँव में फैल रही है! बैं//गन वाला जो कांड तूने रात को किया था, उसकी पूरी रिपोर्ट मेरे पास आ चुकी है!”
यह सुनते ही सविता के घुटने जवाब दे गए। वह ज़मीन पर बैठ गई और रामकिशोर के पैर पकड़कर फूट-फूट कर रोने लगी। “बापू जी! मुझे माफ कर दीजिए! मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई! बापू जी, मुकेश को मत बताइएगा, वरना वह मुझे मार डालेगा और तलाक दे देगा! मेरी बच्ची अनाथ हो जाएगी बापू जी! मेरी इज़्ज़त बचा लीजिए!” सविता गिड़गिड़ा रही थी।
रामकिशोर ने नीचे झुककर सविता की ठोड़ी पकड़ी और उसका चेहरा ऊपर उठाया। रामकिशोर की नज़रें सविता के भीगे हुए चेहरे और उसके उभरते हुए शरीर पर टिक गईं।
“देख बहू,” रामकिशोर की आवाज़ अब धीमी और ज़हरीली हो चुकी थी। “मुकेश दिल्ली में मजे कर रहा है। तू यहाँ अकेली तड़प रही है और ऐसी गं//दी हरकतें कर रही है। अगर यह बात मुकेश तक गई, तो तेरा घर उजड़ जाएगा। गाँव वाले तुझे पत्थरों से मारेंगे।”
“बापू जी, आप जो कहेंगे मैं करूंगी, बस किसी से मत कहिए!” सविता बदहवास होकर बोली।
रामकिशोर ने अपने जाल का पहला पाँसा फेंका, “सविता, बाहर की गं//दी चीज़ों और बैं//गन-मूली से अपनी देह को नुकसान पहुँचाने की क्या ज़रूरत है? घर में मैं भी तो अकेला ही हूँ। तू भी अकेली है और मैं भी अकेला। अगर तू समझदारी दिखाए और मेरे साथ ‘एड//जस्ट’ कर ले, तो यह बात मेरे और तेरे बीच ही दफन रहेगी। मुकेश को कभी पता नहीं चलेगा और तेरी ज़रूरत भी पूरी होती रहेगी।”
यह सुनकर सविता सन्न रह गई! जैसे किसी ने उसके मुंह पर तमाचा मार दिया हो। “बापू जी! आप ये क्या कह रहे हैं?! आप मेरे पिता समान हैं! मेरे पति के बाप हैं! आप मुझसे ऐसी नीच बात कैसे कह सकते हैं?!” सविता गुस्से और घिन से कांपने लगी।
रामकिशोर के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान आ गई। “ठीक है बहू! मत मान मेरी बात। अभी फ़ोन उठाता हूँ और मुकेश को सब सच बता देता हूँ। कह देता हूँ कि तेरी बीवी गाँव में मुंह काला कर रही है। कल सुबह तक मुकेश आकर तुझे धक्के मारकर घर से बाहर निकाल देगा।” इतना कहकर रामकिशोर ने जेब से मोबाइल निकालने का नाटक किया।
सविता का कलेजा मुंह को आ गया। वह जानती थी कि अगर मुकेश को पता चला तो उसका जीवन पूरी तरह तबाह हो जाएगा। समाज उसे जीने नहीं देगा।
“नहीं बापू जी! रुक जाइए! फ़ोन मत कीजिए!” सविता ने रोते हुए रामकिशोर का हाथ पकड़ लिया। “आप… जैसा कहेंगे… मैं वैसा ही करूंगी…”
रामकिशोर के चेहरे पर जीत की चमक आ गई। उन्होंने सविता के सिर पर हाथ फेरा और बोले, “यह हुई न समझदारों वाली बात। आज रात 12 बजे जब बच्ची सो जाए, तो मेरे कमरे में आ जाना।”
अध्याय 8: चारदीवारी में बंद व्यभि//चार और ढलता मर्यादा का पर्दा
उस रात सविता के लिए समय जैसे ठहर गया था। 11 बजे उसने पिंकी को सुलाया। वह अपने कमरे में बैठी रोती रही। एक तरफ उसके पति का विश्वास था, दूसरी तरफ उसकी अपनी शर्मनाक गलती और ससुर का ब्लैकमेल। उसकी मजबूरी ने उसके आत्मसम्मान की बलि चढ़ा दी थी।
रात के 12 बजते ही सविता थर-थर कांपते कदमों से उठी और रामकिशोर के कमरे का दरवाज़ा धकेला। कमरा अंधेरे में डूबा था, सिर्फ़ एक डिम लाइट जल रही थी।
रामकिशोर बिस्तर पर उसका इंतज़ार कर रहे थे। उस रात 60 साल के ससुर ने अपनी ही 30 साल की बहु की मजबूरी और लाचारी का पूरा फायदा उठाया। सविता एक बेजान लाश की तरह बिस्तर पर पड़ी रही और रामकिशोर अपनी बरसों की हवस मिटाता रहा।
यह सिलसिला एक रात का नहीं रहा। यह रोज़ का नियम बन गया।
हर रात 12 बजे सविता को ससुर के कमरे में जाना पड़ता था।
जो काम सविता पहले इंटरनेट पर देखकर खुद से करती थी, अब वह अपने ससुर के साथ दबाव में कर रही थी।
धीरे-धीरे, पाप की इस दलदल में सविता की झिझक भी खत्म होने लगी। शा//रीरिक सुख की आदत ने उसके मन से मर्यादा और नैतिक मूल्यों को मिटाना शुरू कर दिया।
ससुर और बहु का यह अनैतिक संबंध कुछ ही हफ़्तों में इतना गहरा हो गया कि वे घर में बहु और ससुर की तरह नहीं, बल्कि एक गुप्त पति-पत्नी की तरह रहने लगे। दिन में रामकिशोर खेत पर जाते, तो सविता उनके लिए गरम-गरम खाना लेकर जाती। घर में जब बच्ची सो जाती, तो वे दिन में भी मर्यादा की सीमाएँ लांघने लगे।
लेकिन पाप की मटकी कितनी भी गहरी क्यों न हो, एक न एक दिन भर ही जाती है।
अध्याय 9: अचानक हुआ पर्दाफाश और गाँव में मचता हड़कंप
दो महीने बीत चुके थे। रामकिशोर और सविता अपने इस गुप्त खेल में इतने लापरवाह हो चुके थे कि उन्हें आसपास की दुनिया का ध्यान ही नहीं रहता था।
एक दिन दोपहर के लगभग 1:30 बज रहे थे। गाँव में कड़क धूप थी। पिंकी आंगन में खेल रही थी। रामकिशोर और सविता कमरे के अंदर दरवाज़ा सिर्फ़ सटाकर गं//दा काम कर रहे थे। उन्होंने दरवाज़े की कुंडी अंदर से नहीं लगाई थी ताकि किसी को शक न हो कि अंदर कुछ हो रहा है।
तभी, पड़ोसी महिला सुमन (जो सविता की सहेली थी) किसी काम से सविता के घर आई। उसने मुख्य दरवाज़ा खुला देखा, तो वह सीधे आंगन में आ गई।
“सविता! ओ सविता!” सुमन ने आवाज़ लगाई। कोई जवाब नहीं आया। सुमन ने देखा कि अंदर वाले कमरे का किवाड़ थोड़ा सा खुला हुआ है। उसने सोचा कि सविता अंदर सो रही होगी।
सुमन जैसे ही कमरे के दरवाज़े के पास पहुँची और उसने हल्के से किवाड़ को धक्का दिया… अंदर का नज़ारा देखकर उसके पैरों तले की ज़मीन खिसक गई!
अंदर बिस्तर पर 60 साल का रामकिशोर और उसकी बहु सविता आपत्तिजनक स्थिति में थे!
सुमन के मुंह से एक ज़ोरदार चीख निकल गई, “है भगवान!”
कमरे के अंदर हड़कंप मच गया। सविता ने बदहवास होकर अपने कपड़े समेटे और रामकिशोर घबराकर बिस्तर से खड़ा हो गया।
“सुमन दीदी! मेरी बात सुनो!” सविता रोते हुए बाहर भागी। लेकिन सुमन बिना कुछ सुने, थूकते हुए घर से बाहर भाग गई।
“राम-राम! ये क्या अधर्म देख लिया मैंने! ससुर और बहु का ऐसा घिनौना काम!” सुमन चिल्लाते हुए गाँव की गली में भागने लगी।
कुछ ही घंटों में यह बात जंगल की आग की तरह पूरे गाँव में फैल गई। चाय की दुकानों पर, चौपालों पर सिर्फ़ एक ही चर्चा थी—”रामकिशोर और उसकी बहु सविता रंगे हाथों पकड़े गए!”
गांव के सरपंच और गणमान्य लोगों ने तुरंत इस बात का संज्ञान लिया। गाँव के एक युवक ने तुरंत दिल्ली में मुकेश को फ़ोन मिलाया।
“हेलो मुकेश! तुम तुरंत पहली ट्रेन पकड़कर गाँव आओ!” मुकेश घबरा गया, “क्या हुआ भाई? बापू जी की तबीयत ख़राब है क्या?” “अरे बापू की छोड़! तेरे घर में जो पाप चल रहा है, उसे आकर अपनी आँखों से देख! तेरे बापू और तेरी बीवी ने गाँव की नाक कटवा दी है!”
अध्याय 10: मुकेश की वापसी, पारिवारिक तबाही और करुणा जनक अंत
मुकेश के पैरों तले से ज़मीन निकल गई। वह बिना कोई सामान लिए, उसी रात दिल्ली से पंजाब के लिए बस में बैठ गया। पूरे रास्ते मुकेश का दिमाग सुन्न रहा। उसे अपनी आँखों पर और कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था। जिस पिता को वह भगवान मानता था और जिस पत्नी पर उसे अंधविश्वास था, वे ऐसा कर सकते हैं?
अगली सुबह मुकेश जब गाँव पहुँचा, तो उसके घर के बाहर गाँव वालों की भीड़ जमा थी। माहौल बेहद तनावपूर्ण था।
मुकेश घर के अंदर घुसा। आंगन में रामकिशोर सिर झुकाए बैठे थे और कमरे के अंदर सविता अपनी बच्ची को सीने से लगाए रो रही थी।
मुकेश ने दहाड़ते हुए पूछा, “बापू! यह सब क्या सुन रहा हूँ मैं?!”
रामकिशोर कुछ न बोल सके। उनकी आँखें शर्म से ज़मीन में गड़ी थीं।
मुकेश कमरे में गया और उसने सविता का बाल पकड़कर उसे खींचते हुए बाहर लाया। “बोल सविता! क्या गाँव वाले जो कह रहे हैं वो सच है?!”
सविता मुकेश के पैरों में गिर पड़ी और रो-रोकर पूरी सच्चाई उगल दी। उसने बताया कि कैसे बैं//गन वाला हादसा हुआ, कैसे वह अस्पताल गई और कैसे बापू जी ने उसे ब्लैकमेल करके इस दलदल में धकेला।
यह सुनकर मुकेश स्तब्ध रह गया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह किसे ज़्यादा दोषी ठहराए—अपनी वासना अंधी पत्नी को या अपने हवसी बाप को?
मुकेश गुस्से में आगबबूला हो गया। उसने अपनी पत्नी पर हाथ उठाया, लेकिन फिर अपनी 4 साल की बिलखती हुई बच्ची पिंकी को देखकर रुक गया।
“बापू!” मुकेश ने रामकिशोर की तरफ देखते हुए कहा, “आपने पिता के नाम को कलंकित कर दिया! मैंने आपको यहाँ इसलिए छोड़ा था ताकि आप मेरे घर की रक्षा करें, लेकिन आप ही भक्षक बन गए!”
मुकेश ने तुरंत एक कड़ा फैसला लिया।
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उसने अपनी पत्नी सविता और बच्ची पिंकी को उठाया और उनका सामान बैग में भरा।
उसने गाँव वालों के सामने घोषणा की, “आज से मेरा इस आदमी (रामकिशोर) से कोई रिश्ता नहीं है! यह मेरे लिए मर चुका है!”
मुकेश अपनी पत्नी और बेटी को लेकर हमेशा के लिए दिल्ली चला गया।
अंतिम दुखद अध्याय:
गाँव में रामकिशोर का पूरी तरह से सामाजिक बहिष्कार (Social Boycott) कर दिया गया।
न कोई उनसे बात करता था, न कोई उनके घर जाता था।
बाज़ार में उन्हें देखकर लोग थूक देते थे।
दुकानदारों ने उन्हें राशन देना बंद कर दिया।
रामकिशोर अपने ही विशाल घर में पूरी तरह अकेले पड़ गए। न उन्हें खाना बनाने आता था, न कपड़े धोने। पश्चाताप और शर्म के बोझ ने उन्हें अंदर से तोड़ दिया। जो ससुर अपनी बहु की लाचारी का फायदा उठाकर अपनी हवस मिटा रहा था, अब उसे रोटी के एक-एक टुकड़े के लिए तरसना पड़ रहा था।
केवल दो महीने के भीतर, रामकिशोर का शरीर सूखकर कंकाल बन गया। वे गंभीर डिप्रेशन और भुखमरी का शिकार होकर चारपाई पर पड़ गए।
एक दिन पड़ोसियों को उनके घर से भयंकर दुर्गंध आई। जब गाँव वालों ने दरवाज़ा तोड़ा, तो देखा कि रामकिशोर चारपाई पर मृत पड़े थे। उनकी सड़ती हुई लाश को मुखाग्नि देने वाला भी कोई नहीं था। अंत में पुलिस और समाज सेवियों ने उनका अंतिम संस्कार किया।
उधर दिल्ली में, मुकेश ने सविता को माफ तो नहीं किया, लेकिन अपनी बच्ची के भविष्य के लिए उसने सविता को अपने साथ रखा। लेकिन उनके बीच का प्यार और विश्वास हमेशा के लिए खत्म हो चुका था। वे एक ही छत के नीचे दो अजनबियों की तरह रहने लगे। सविता जीवन भर पश्चाताप की आग में जलती रही।
कहानी का नैतिक संदेश (Conclusion & Lesson)
यह कहानी हमें समाज और परिवार के कई कड़वे सत्यों से रूबरू कराती है:
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अ//श्लील सामग्री और गलत ल//त का दुष्परिणाम: इंटरनेट पर अ//श्लील और काम//ुक सामग्री देखने की ल//त इंसान के विवेक को नष्ट कर देती है और उसे ऐसे अनैतिक कदम उठाने पर मजबूर कर देती है जिसकी भरपाई जीवन भर नहीं हो सकती।
मर्यादा और रिश्तों का हनन: ससुर और बहु का रिश्ता बाप और बेटी जैसा पवित्र होता है। अपनी हवस और स्वार्थ के लिए किसी की मजबूरी का फायदा उठाना अंततः विनाश का कारण बनता है।
पारिवारिक संवाद की कमी: पति-पत्नी के बीच दूरी और संवादहीनता अक्सर अनैतिक रास्तों का द्वार खोलती है।
कर्म का फल: गलत काम का नतीजा हमेशा भयानक होता है। रामकिशोर ने अपनी हवस के लिए जिस बहु की मजबूरी का फायदा उठाया, अंत में उन्हें तड़प-तड़प कर अनाम मौत मरना पड़ा।