मेला देखने गई बहन के साथ गलत होने पर भाई ने रच दिया इतिहास/भाई ने लिया बदला/
उत्तर प्रदेश के मेरठ की सत्य घटना पर आधारित कहानी: बहसुमा का रक्तचरित्र
अध्याय १: बहसुमा का सीधा-साधा किसान और उसका संसार
भारतीय राज्य उत्तर प्रदेश का मेरठ जिला अपनी ऐतिहासिक धरोहरों, पौराणिक कथाओं और लहलहाते कृषि खेतों के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध है। इसी कृषि प्रधान मेरठ जिले के भीतर बसा हुआ है बहसुमा नाम का एक शांत देहाती गांव। बहसुमा गांव का दृश्य किसी चित्रकार की मनमोहक पेंटिंग जैसा प्रतीत होता है, जहां चारों तरफ ईख यानी गन्ने के हरे-भरे घने खेत, दूर-दूर तक फैली लहलहाती फसलें और सीधी-साधी ग्रामीण जीवनशैली देखने को मिलती है। इस गांव की आबो-हवा में मिटटी की वह भीनी खुशबू बसी हुई थी जो मेहनत और ईमानदारी की गवाही देती थी।
इसी बहसुमा गांव की पावन माटी में राजवीर सिंह नाम का एक अत्यंत सीधा-सच्चा, कर्मठ और स्वाभिमानी किसान अपने छोटे से हंसते-खेलते परिवार के साथ निवास करता था। राजवीर सिंह के पास पुरखों की विरासत के तौर पर कुल जमा चार एकड़ कृषि योग्य भूमि थी। चार एकड़ जमीन आज के दौर में बहुत बड़ी संपत्ति नहीं मानी जाती, परंतु राजवीर सिंह उसी जमीन पर दिन-रात मेहनत करके, अपने माथे का पसीना बहाकर अपने पूरे परिवार का पालन-पोषण बड़ी ही इज्जत, शान और ईमानदारी के साथ किया करते थे। गांव का हर छोटा-बड़ा व्यक्ति राजवीर सिंह के शांत स्वभाव, उनकी सादगी और उनकी अटूट सत्यनिष्ठा के कारण उनका अपार सम्मान करता था। राजवीर भी कभी किसी के प्रति दुर्भावना नहीं रखते थे, बल्कि गांव के हर सुख-दुख में सबसे आगे बढ़कर हिस्सा लिया करते थे। किसी भी पड़ोसी या ग्रामीण पर कोई मुसीबत आती तो राजवीर सिंह कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हो जाते थे।
राजवीर सिंह के इस छोटे से खुशहाल परिवार में उनकी धर्मपत्नी सरस्वती देवी थीं। सरस्वती देवी अत्यंत गृहिणी स्वभाव की, दयालु और धार्मिक संस्कारों वाली देहाती स्त्री थीं। सुबह तड़के चार बजे उठने से लेकर देर रात तक घर का चूल्हा-चौका, चौका-बर्तन, साफ-सफाई और पशुओं की देखभाल में ही उनका पूरा दिन बीत जाता था। सरस्वती देवी का जीवन अपने पति और बच्चों की खुशी के आसपास ही घूमता था।
राजवीर और सरस्वती देवी के दो संतानें थीं। बड़ा बेटा अर्जुन था और छोटी बेटी इंदु थी। अर्जुन ने एक वर्ष पूर्व ही मेरठ शहर के एक प्रतिष्ठित महाविद्यालय से स्नातक यानी बी.ए. की परीक्षा अच्छे अंकों से उत्तीर्ण की थी। पढ़ाई पूरी करने के बाद अर्जुन ने कई महीनों तक शहर और आसपास के कस्बों में किसी अच्छी सरकारी या निजी नौकरी के लिए दिन-रात अथक प्रयास किया था। उसने कई प्रतियोगी परीक्षाएं दीं, दर-दर भटककर नौकरियां तलाशीं, परंतु आज के इस बेरोजगारी के दौर में जब उसे कोई उचित नौकरी न मिल सकी, तो थक-हारकर अर्जुन ने अपने स्वाभिमान को बनाए रखते हुए अपने पिता राजवीर सिंह के साथ ही खेती-किसानी के काम में हाथ बंटाना शुरू कर दिया। अर्जुन एक अत्यंत सुसंस्कृत, बलवान और आज्ञाकारी पुत्र था। वह अपने पिता का बहुत आदर करता था और एक जिम्मेदार बेटे की भांति खेत के हर कठिन से कठिन काम को हंसते-हंसते निपटाया करता था।
दूसरी तरफ राजवीर की छोटी बेटी इंदु थी, जिसने हाल ही में बारहवीं कक्षा की बोर्ड परीक्षा उत्तीर्ण की थी। इंदु अत्यंत सुंदर, सुशील, चंचल और घरेलू स्वभाव की लड़की थी। वह घर पर रहकर अपनी मां सरस्वती के साथ खाना बनाने, घर की साफ-सफाई और छोटे-मोटे कामों में मदद किया करती थी। इसके साथ ही इंदु को सिलाई और कढ़ाई का काम सीखने का बहुत शौक था। वह गांव की ही एक हुनरमंद महिला के पास जाकर सिलाई के नए-नए डिजाइन और परिधान बनाना सीखा करती थी।
मां सरस्वती अक्सर अपनी बेटी इंदु से कहा करती थीं कि बेटी तू आगे कॉलेज में दाखिला ले ले और अपनी पढ़ाई जारी रख, ताकि तेरा भविष्य और भी बेहतर हो सके और तू किसी शहर में अच्छी मुकाम हासिल कर सके। परंतु इंदु अपनी मां के गले में बांहें डालकर मुस्कुराते हुए यही जवाब देती थी कि मां मुझे आगे किताबों में सिर खपाना बिल्कुल रास नहीं आता है, मुझे अपने घर का काम संभालना, सिलाई-कढ़ाई करना और परिवार के साथ रहना ही ज्यादा भाता है, इसलिए मैं आगे कोई पढ़ाई नहीं करूंगी। मां सरस्वती भी अपनी लाडली बेटी की इस जिद के आगे मुस्कुराकर हार मान लिया करती थीं। इस प्रकार राजवीर सिंह का यह छोटा सा परिवार अपनी सीमित आमदनी और चार एकड़ खेत के भरोसे बेहद खुशहाल, शांत और संतुष्ट जीवन व्यतीत कर रहा था।
अध्याय २: अहंकार, संपत्ति और एक आवारा साया
परंतु इस शांत और खुशहाल गांव के वातावरण में एक ऐसा जहरीला ग्रहण लगने वाला था जिसकी कल्पना शायद किसी ने अपने बुरे से बुरे सपने में भी नहीं की होगी। राजवीर सिंह के घर से महज कुछ ही दूरी पर रमेश सिंह का विशाल और भव्य पक्का मकान बना हुआ था। रमेश सिंह गांव के जमींदार घराने से ताल्लुक रखते थे। उनके पास गांव में लगभग बत्तीस एकड़ उपजाऊ भूमि थी, अथाह धन-दौलत थी, पक्के मकान थे और राजनीतिक गलियारों तक बड़ा रुतबा तथा शोहरत थी।
परंतु धन और संपत्ति के इस विशाल साम्राज्य के बीच रमेश सिंह के पास जिस चीज की सबसे बड़ी कमी थी, वह थी संस्कार और सामाजिक इज्जत। रमेश सिंह का इकलौता बेटा था पिंटू। पिंटू बचपन से ही बिगड़ैल, आवारा, कामचोर और अहंकार से लबरेज लड़का था। पिता के पास बेशुमार पैसा, गाड़ियां और इलाके में दबदबा होने के कारण पिंटू के सिर पर धन का घमंड सिर चढ़कर बोलता था। उसे न तो कानून का कोई डर था और न ही समाज के नीति-नियमों का कोई खौफ था।
पिंटू एक ऐसा नीच और पतित प्रवृत्ति का युवक बन चुका था, जो गांव की बहू-बेटियों और बहनों को कभी सम्मान की नजर से नहीं देखता था। उसकी नजरों में किसी भी परिवार की इज्जत और मर्यादा की कोई कीमत नहीं थी। वह दिन-रात अपने अवारा दोस्तों के साथ घूमता रहता, न//शे में धुत रहता और गांव की गलियों व पगडंडियों पर आने-जाने वाली भोली-भाली लड़कियों पर छींटाकशी करना, उन्हें ग//ंदे इशारे करना और तंग करना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता था।
गांव के अधिकतर गरीब और मध्यमवर्गीय लोग रमेश सिंह के दबदबे, पैसे और पुलिसिया पहुंच के डर से पिंटू की इन घिनौनी करतूतों को चुपचाप सह जाते थे। कोई भी ग्रामीण उसके खिलाफ मुंह खोलने या शिकायत करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था क्योंकि सब जानते थे कि रमेश सिंह अपने बेटे की हर गलती पर पर्दा डालने के लिए धन और ताकत का नंगा नाच कर सकता है। पिंटू की यही ह//व//स, गुंडागर्दी और बदतमीजी आगे चलकर राजवीर सिंह की मासूम बेटी इंदु के जीवन में दो बहुत बड़े विनाशकारी तूफानों को जन्म देने वाली थी। उस समय तक न तो राजवीर को इस बात का कोई अंदाजा था और न ही गांव के किसी अन्य निर्दोष इंसान को इस भयावह भविष्य की भनक थी।
अध्याय ३: १ फरवरी २०२६ – थप्पड़ और प्रतिशोध की पहली चिंगारी
समय का पहिया अपनी अटूट गति से घूमता रहा और शीत ऋतु का अंत होते-होते कैलेंडर में एक तारीख आ जाती है। १ फरवरी २०२६ का दिन था और सुबह के लगभग दस बजे का समय था। हल्की-हल्की सुनहरी धूप खिली हुई थी जो सर्दियों की गुनगुनी राहत दे रही थी। राजवीर सिंह अपने घर के आंगन में बैठकर चाय की चुस्कियां ले रहे थे, तभी वे अपने बेटे अर्जुन को आवाज लगाते हैं और कहते हैं कि बेटा अर्जुन, चलो आज खेत में चलना है, वहां सिंचाई का काम देखना है और फसल की देखभाल का काफी काम पेंडिंग पड़ा हुआ है।
अर्जुन तुरंत अपनी चाय खत्म करके तैयार हो जाता है और अदब से कहता है कि जी पिताजी, चलिए मैं आपके साथ खेत चलता हूं। इसके बाद बाप-बेटे दोनों अपनी कुल्हाड़ी, फावड़ा और औजार लेकर खेतों की तरफ निकल पड़ते हैं। राजवीर और अर्जुन के घर से जाने के लगभग आधे घंटे बाद, घर में चूल्हा-चौका संभालते हुए मां सरस्वती देवी की नजर रसोईघर के डिब्बे पर पड़ती है। वह देखती हैं कि चाय की पत्ती और चीनी के डिब्बे में चीनी बिल्कुल खत्म हो चुकी है।
सरस्वती देवी अपनी बेटी इंदु को पुकारती हैं और कहती हैं कि बेटी इंदु, शाम को तेरे पिता और भाई जब खेत से थके-हारे लौटेंगे तो उनके लिए कड़क चाय बनानी पड़ेगी, तू ऐसा कर सामने वाली परचून की दुकान पर जाकर पांच किलो चीनी खरीद ला। सरस्वती देवी अपनी साड़ी के पल्लू से कुछ रुपये निकालकर इंदु को देती हैं। इंदु पैसे हाथ में लेकर खुशी-खुशी अपने घर का लकड़ी का दरवाजा लांघकर बाहर गली में निकल पड़ती है।
इंदु जैसे ही गांव की पतली कच्ची सड़क पर पैदल चलती हुई दुकान की तरफ बढ़ रही होती है, तो ठीक उसी समय वहां से रमेश सिंह का बिगड़ैल बेटा पिंटू अपनी तेज रफ्तार मोटरसाइकिल नचाता हुआ गुजर रहा होता है। पिंटू की नीच नजरें जैसे ही गली में अकेली चलती हुई इंदु पर पड़ती हैं और वह इंदु के रूप-रंग, मासूमियत और सादगी को देखता है, तो उसकी नीच नीयत डोल जाती है। पिंटू अपनी मोटरसाइकिल धीमी करता है और अपने कदम तेज करके इंदु के बिल्कुल पास आ जाता है।
पिंटू एक अत्यंत अ//श्ली//ल और घिनौनी मुस्कान के साथ इंदु के सामने आकर खड़ा हो जाता है और कहता है कि इंदु रानी, इतनी अकेली-अकेली कहां जा रही हो, थोड़ा हमसे भी तो हंसकर बात कर लो। इंदु पिंटू की ग//ंदी नीयत को तुरंत भांप जाती है और बिना कोई जवाब दिए, चुपचाप अपनी नजरें नीची किए तेजी से आगे बढ़ने लगती है। परंतु पिंटू का दुस्साहस और बढ़ जाता है। वह लपककर इंदु का रास्ता रोक लेता है और बेहद बेशर्मी के साथ इंदु से कहता है कि इंदु, तेरी इस खूबसूरती को छूने और टच करने में जो म//जा आता है, वो म//जा दुनिया की किसी और चीज में नहीं आ सकता।
पिंटू की यह ग//ंदी और अ//श्ली//ल बात सुनते ही स्वाभिमानी इंदु का खून खौल उठता है। इंदु बिना किसी डर के, अपनी आंखें तरेरकर कड़े शब्दों में पिंटू को मुंहतोड़ जवाब देती हुई कहती है कि तेरे घर के अंदर भी तेरी सगी बहन बैठी है, तू एक बार जाकर उसको टच करके देख, तुझे उससे भी ज्यादा म//जा आएगा। इंदु के इस करारे और तीखे जवाब को सुनते ही अहंकार में अंधे पिंटू का चेहरा गुस्से से लाल हो जाता है। वह अपना आपा खो देता है और उसी समय झपट्टा मारकर इंदु का दुपट्टा खीं//च लेता है।
परंतु इंदु भी कोई कमजोर या दब्बू लड़की नहीं थी। उसने पलक झपकते ही अपना दायां हाथ उठाया और पिंटू के गाल पर एक के बाद एक दो करारे थप्पड़ जड़ दिए। थप्पड़ की गूंज से पिंटू सन्न रह जाता है, उसका गाल लाल हो जाता है और अपमान की आग में जलते हुए वह पिंटू इंदु के क//प//ड़े फा//ड़//ने के लिए आगे बढ़ता है। लेकिन इंदु पूरी हिम्मत जुटाकर पिंटू को पूरी ताकत से धक्का देती है और बिना डरे तेजी से भागकर पास की परचून की दुकान के अंदर घुस जाती है।
पिंटू पीछे से चिल्लाते हुए इंदु को भ//या//नक ध//म//की देता है और कसम खाते हुए कहता है कि याद रखना इंदु, एक दिन तुझे तेरे ही घर से उठ//वा//कर ले जाऊंगा और तेरा वो हाल करूंगा कि तू पूरे गांव में कहीं मुंह दिखाने के लायक नहीं रहेगी। परंतु उस समय इंदु इस ध//म//की को किसी आवारे और बदतमीज लड़के की बकबक समझकर नजरअंदाज कर देती है। वह दुकान से पांच किलो चीनी का पैकेट खरीदती है और कांपते कदमों से अपने घर वापस लौट आती है।
अध्याय ४: खामोशी का जहर और मां की मजबूरी
घर पहुंचने के बाद इंदु का दिल घबराहट से जोर-जोर से धड़क रहा था। उसकी सांसें फूल रही थीं। वह सीधे अपनी मां सरस्वती के पास रसोई में जाती है और कांपती हुई आवाज में पूरी घटना का विवरण देती है। इंदु कहती है कि मां, हमारे पड़ोस का रहने वाला वो पिंटू लड़का आज रास्ते में मेरा हाथ पकड़ रहा था और उसने मेरा दुपट्टा खीं//च लिया था, लेकिन मैंने भी डरने के बजाय उसके मुंह पर दो करारे तमाचे जड़ दिए हैं।
यह सुनते ही मां सरस्वती का चेहरा पीला पड़ जाता है। उनके हाथ से पीतल का बर्तन छूटकर जमीन पर गिर पड़ता है और उसकी खनक सन्नाटे में गूंज उठती है। सरस्वती देवी एक अनुभवी, समझदार और देहाती महिला थीं। वह अच्छी तरह जानती थीं कि पिंटू कितना रसूखदार, दबंग और खतरनाक लड़का है और उसका बाप रमेश सिंह पैसे के बल पर क्या कर सकता है।
सरस्वती तुरंत अपनी बेटी इंदु के दोनों हाथ कसकर पकड़ लेती हैं और रोने जैसे स्वर में उसे समझाना शुरू करती हैं। सरस्वती कहती हैं कि बेटी इंदु, भूलकर भी इस घटना का जिक्र अपने पिता राजवीर या अपने भाई अर्जुन के सामने मत करना। तुझे तो पता ही है कि तेरे भाई अर्जुन का मिजाज कितना गर्म है और वह स्वाभिमान के मामले में किसी से नहीं डरता। अगर अर्जुन को इस बात की भनक भी लग गई तो वह गुस्से में आकर पिंटू से भिड़ जाएगा और अपनी जान जोखिम में डाल लेगा। तेरे भाई की जान को बहुत बड़ा खतरा हो जाएगा और वैसे भी पिंटू का बाप बहुत अमीर है, वह अपनी ताकत से हमारा पूरा घर बर्बाद कर देगा, पुलिस भी उसी की सुनेगी।
इंदु अपनी मां की आंखों में तैरते हुए डर, बेबसी और चिंता को देखकर शांत हो जाती है। वह अपने भाई की जान और परिवार की शांति के खातिर अपनी मां को वचन देती है कि मां, मैं यह बात पिताजी या अर्जुन भैया को कभी नहीं बताऊंगी। इस प्रकार मां और बेटी दोनों आपस में बात करके खामोश बैठ जाती हैं। लेकिन इंदु और उसकी मां सरस्वती यह नहीं जानती थीं कि अपनी इज्जत और परिवार की सुरक्षा के नाम पर उठाई गई यह खामोशी भविष्य में एक बहुत बड़े काल का रूप धारण करके उनके सामने आने वाली थी।
अध्याय ५: १५ फरवरी २०२६ – ईख के खेत में घटी भयानक दास्तान
दिन बीतते चले गए और देखते ही देखते आधी फरवरी का महीना निकल गया। कैलेंडर में तारीख आ जाती है १५ फरवरी २०२६ का दिन। सुबह के लगभग आठ बजे का समय था। शीतकालीन सुबह की हल्की धुंध छंट रही थी। राजवीर सिंह अपने घर के आंगन में बैठकर चाय पी रहे थे, तभी वह अपने बेटे अर्जुन को बुलाकर कहते हैं कि बेटा अर्जुन, आजकल खेतों में ईख यानी गन्ने की कटाई का सीजन पूरे जोरों पर चल रहा है, व्यापारी को गन्ना सप्लाई करना है। आज हमें पूरे दिन खेत में रहकर गन्ने की छिलाई और कटाई करनी पड़ेगी, काम बहुत ज्यादा है। इसलिए ऐसा करते हैं कि दोपहर का खाना भी खेत में ही मंगवा लेते हैं, तेरी बहन इंदु दोपहर में खाना लेकर खेत पर आ जाएगी।
अर्जुन भी अपने पिता की बात से सहमत होकर अपनी बहन इंदु से कहता है कि इंदु, आज खेत में बहुत काम है, हमें लौटने में देर हो सकती है, तू दोपहर के समय हम दोनों के लिए ताजा खाना बनाकर खेत में पहुंचा देना। इंदु मुस्कुराते हुए कहती है कि अर्जुन भैया, आप चिंता मत करो, मैं बिल्कुल ठीक समय पर खाना लेकर आ जाऊंगी। इसके बाद राजवीर सिंह और अर्जुन अपने सिर पर गमछा बांधकर, हाथ में कुल्हाड़ी और दरांती लेकर खेत की तरफ चले जाते हैं और गन्ने के घने खेतों में कटाई का काम शुरू कर देते हैं।
काम करते-करते दोपहर के साढ़े बारह बज जाते हैं। कड़क धूप निकल आती है और कड़ी मेहनत करते हुए राजवीर तथा अर्जुन को जोरों की भूख लग जाती है। अर्जुन अपनी जेब से कीपैड मोबाइल निकालता है और अपनी बहन इंदु को फोन लगाकर कहता है कि इंदु, जल्दी से खाना तैयार कर ले और खेत में लेकर आ, हमें बहुत तेज भूख लगी है। इंदु फोन पर कहती है कि भैया बस खाना तैयार है, मैं अगले बीस-पचचीस मिनट में खेत में पहुंच रही हूं।
इसके बाद इंदु जल्दी-जल्दी चूल्हे पर गरम रोटियां सेकती है, आलू-गोभी की सब्जी और दाल को टिफिन में अच्छी तरह पैक करती है और अपनी मां सरस्वती से कहती है कि मां, मैं खेत में खाना देने जा रही हूं, लगभग एक घंटे में वापस आ जाऊंगी। सरस्वती कहती हैं कि ठीक है बेटी, ध्यान से जाना। इस तरह इंदु टिफिन हाथ में लिए अपने घर से खेतों की ओर जाने वाली सुनसान और सुनसान पगडंडी पर अकेली निकल पड़ती है।
इंदु गांव की मुख्य पक्की सड़क को पार करके खेतों के बीच बनी संकरी मिट्टी की पगडंडी पर पैदल चल रही थी। चारों तरफ छह-सात फीट ऊंचे ईख के लंबे-लंबे घने खेत खड़े थे। दूर-दूर तक कोई इंसान या पशु नजर नहीं आ रहा था। ठीक उसी समय पिंटू अपने परम मित्र संजू के साथ अपनी तेज रफ्तार मोटरसाइकिल पर उसी पगडंडी के मोड़ से गुजर रहा होता है। पिंटू और संजू दोनों ने सुबह से ही श//रा//ब और न//शे का सेवन कर रखा था और दोनों की आंखें लाल थीं।
अचानक पिंटू की नजर पगडंडी पर अकेली चलती हुई इंदु पर पड़ती है। पिंटू तुरंत मोटरसाइकिल की गति धीमी करता है और अपने दोस्त संजू के कंधे पर हाथ मारते हुए नीच स्वर में कहता है कि संजू देख, सामने राजवीर की बेटी इंदु जा रही है, आज यह बिल्कुल अकेली है, सड़क एकदम सुनसान है, चारों तरफ ईख के घने खेत हैं और दूर-दूर तक हमारी ची//ख सुनने वाला भी कोई नहीं है। आज उस दिन के थप्पड़ का बदला लेने और इसका म//जा चखने का इससे बेहतरीन मौका फिर कभी नहीं मिलेगा।
संजू भी न//शे में धुत था और उसकी नीयत भी उतनी ही ग//ंदी और घटिया थी। संजू तुरंत पिंटू की बात में हां मिला देता है। पिंटू मोटरसाइकिल को तेजी से दौड़ाकर इंदु के बिल्कुल आगे लाकर तिरछी खड़ी कर देता है, जिससे इंदु का रास्ता पूरी तरह रुक जाता है। इंदु घबराकर पीछे हटने की कोशिश करती है, लेकिन इससे पहले कि वह भाग पाती, पिंटू और संजू दोनों मोटरसाइकिल से नीचे कूदते हैं और झपटकर इंदु को बीच रास्ते में ही दबोच लेते हैं।
इंदु डर के मारे ची//ख//ने और चिल्लाने के लिए अपना मुंह खोलती है, परंतु संजू बड़ी फुर्ती से अपनी जेब से एक मैला रुमाल निकालता है और इंदु के मुंह के भीतर कपड़ा ठू//स देता है, जिससे उसकी आवाज पूरी तरह दब जाती है और सिर्फ एक घुटती हुई कराह बाहर निकल पाती है। इसके बाद पिंटू और संजू इंदु के दोनों हाथ मरोड़कर उसे घसीटते हुए सड़क के किनारे खड़े ईख के घने खेत के बिल्कुल अंदर गहराई में ले जाते हैं।
अध्याय ६: आंसुओं की नदी और ढका हुआ सच
ईख के खेत के सन्नाटे और घने अंधेरे में ले जाकर पिंटू अपनी जेब से एक च//मकता हुआ धारदार चा//कू निकालता है और इंदु की सुराहीदार गर्दन पर टिका देता है। पिंटू इंदु के चेहरे के पास अपना घिनौना न//शे से धुत चेहरा लाकर फूं//कारता है कि अगर जरा सी भी आवाज निकाली या हिलने की कोशिश की तो अभी तेरी गर्दन उता//र दूंगा। इसके बाद पिंटू और संजू इंदु के क//प//ड़े फा//ड़ डालते हैं और उस मासूम अकेली लड़की के साथ बारी-बारी से ग//लत का//म और है//वा//नि//यत करना शुरू कर देते हैं।
इंदु अपनी भीगी आंखों से दोनों के सामने हाथ जोड़ती है, पैरों में गिरती है और रहम की भीख मांगती है। परंतु उन न//शे में अंधे राक्षसों के सिर पर ह//व//स का भूत सवार था। पिंटू और संजू इंदु के साथ तब तक उस ग//लत का//म को अंजाम देते रहते हैं, जब तक कि उनकी ग//ंदी वासना शांत नहीं हो जाती। जब उनका यह घिनौना खेल खत्म हो जाता है, तो पिंटू इंदु के बाल पकड़कर घसीटता है और भ//या//नक ध//म//की देते हुए कहता है कि अगर तूने इस बात का जिक्र अपने घर में किसी से भी किया या पुलिस में जाने की कोशिश की तो तेरे भाई अर्जुन और तेरे बाप राजवीर को जान से मा//र दूंगा, तेरे पूरे परिवार को जिंदा जला दूंगा।
इंदु खौफ से कांपने लगती है और रोते हुए चुप रहने का इशारा करती है। इसके बाद पिंटू और संजू अपने कपड़े ठीक करते हैं, इंदु को वहीं ईख के पत्तों पर लहूलुहान और बदहवास अवस्था में छोड़कर बाहर निकलते हैं, अपनी मोटरसाइकिल स्टार्ट करते हैं और वहां से र//फू च//क्कर हो जाते हैं। पिंटू और संजू के जाने के बाद इंदु काफी देर तक उस ठंडे खेत में पड़ी रोती रहती है। फिर किसी तरह हिम्मत जुटाकर खड़ी होती है, अपने फटे हुए कपड़ों को संभालती है, जमीन पर गिरा हुआ खाने का टिफिन उठाती है। लेकिन अब उसमें अपने भाई या पिता के पास खेत में जाने की हिम्मत बिल्कुल नहीं बची थी।
वह किसी तरह गिरते-पड़ते कदमों से अपने घर वापस आ जाती है। घर के अंदर घुसते ही वह टिफिन मेज पर पटकती है और सीधे अपने कमरे में जाकर बिस्तर पर मुंह ढककर फूट-फूटकर रोना शुरू कर देती है। मां सरस्वती रसोई से बाहर निकलकर देखती हैं कि टिफिन वैसा का वैसा ही रखा है और उसमें से खाना तक बाहर नहीं निकाला गया है। सरस्वती देवी के मन में कुविचार आने लगते हैं और वह समझ जाती हैं कि जरूर रास्ते में कोई बहुत बड़ी अनहोनी घटना घटी है।
सरस्वती दौड़कर इंदु के कमरे में जाती हैं और अपनी बेटी को गले से लगाकर पूछने लगती हैं कि बेटी इंदु बोल क्या हुआ है, तू अपने पिता के पास खेत में क्यों नहीं गई और ऐसे क्यों रो रही है? इंदु अपनी मां के गले से लिपटकर बिलख-बिलखकर पूरी दर्दनाक दास्तान बयां करती है। इंदु रोते हुए कहती है कि मां, रास्ते में पिंटू और उसके दोस्त संजू ने मुझे ईख के खेत में घसीट लिया और मेरे साथ बहुत ग//लत और गं//दा का//म किया है, उन्होंने मेरी इज्जत लू//ट ली मां!
यह बात सुनते ही सरस्वती देवी के सिर पर जैसे पहाड़ टूट पड़ता है। उनके पैरों तले जमीन खिसक जाती है और वह बदहवास होकर जमीन पर बैठ जाती हैं। सरस्वती देवी रोते हुए अपनी छाती पीटने लगती हैं कि हे भगवान, यह क्या जुल्म हो गया मेरी मासूम बेटी के साथ! लेकिन कुछ ही देर में सरस्वती देवी का देहाती डर फिर से जाग उठता है। वह अपनी सुध-बुध संभालती हैं और रोती हुई इंदु के आंसू पोंछते हुए हाथ जोड़कर कहती हैं कि बेटी इंदु, मेरी बात कान खोलकर सुन ले, तुझे यह बात दुनिया में किसी भी तीसरे इंसान को नहीं बतानी है।
सरस्वती समझाती हैं कि अगर यह बात गांव में फैल गई तो हमारी इज्जत का जनाजा निकल जाएगा, पूरे गांव में थू-थू होगी, तेरे पिता और तेरा भाई अर्जुन किसी को मुंह दिखाने के लायक नहीं रहेंगे और अर्जुन गुस्से में जाकर रमेश सिंह के बेटे को मा//र देगा, जिससे हमारा पूरा हंसता-खेलता परिवार त//बाह हो जाएगा। पिंटू बहुत ताकतवर है, उसके पास पैसा है, पुलिस और नेता सब उसकी जेब में हैं, हम गरीब लोग उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। इंदु अपनी मां के डर और आंसुओं को देखकर रोते हुए अपना सिर हिला देती है और कहती है कि ठीक है मां, मैं यह दर्द सह लूंगी लेकिन किसी से कुछ नहीं कहूंगी।
इसके बाद सरस्वती देवी अपनी चतुराई से काम लेती हैं। वह ठंडे हो चुके खाने को दोबारा चूल्हे पर गरम करती हैं, टिफिन में पैक करती हैं और खुद खाना लेकर खेत में अपने पति राजवीर और बेटे अर्जुन के पास चली जाती हैं। सरस्वती वहां जाकर राजवीर और अर्जुन को खाना खिलाती हैं और झूठ बोल देती हैं कि इंदु के सिर में अचानक बहुत तेज दर्द हो गया था, इसलिए वह खाना लेकर नहीं आ सकी। खाना खाने के बाद सरस्वती बर्तन लेकर घर लौट आती हैं।
शाम होते ही थक-हारकर राजवीर और अर्जुन घर आते हैं। अर्जुन अपनी बहन इंदु के उदास और उतरे हुए चेहरे को देखकर पूछता है कि इंदु, तेरी तबीयत कैसी है, तू दोपहर में बहुत बीमार लग रही थी? इंदु अपनी आंखों के आंसू छुपाते हुए झूठ बोल देती है कि भैया बस थोड़ा सा बुखार था, अब मैं ठीक हूं। अर्जुन अपनी बहन के सिर पर हाथ फेरता है और बात वहीं खत्म हो जाती है। परंतु आने वाले दिनों में इंदु की हंसी गायब हो चुकी थी। वह दिन भर गुमसुम रहती थी। राजवीर और अर्जुन महसूस करते थे कि इंदु किसी गहरी चिंता में है, लेकिन वे इसे उसकी सामान्य अस्वस्थता समझकर नजरअंदाज करते रहे।
अध्याय ७: १ मार्च २०२६ – सहेली का जन्मदिन और फिर वही मनहूस साया
समय का पहिया आगे बढ़ता रहा और पंद्रह दिन बीत गए। अब तारीख आ जाती है १ मार्च २०२६ का दिन। शाम के लगभग साढ़े पांच बजे का समय था और सूर्य ढलने वाला था। राजवीर सिंह और अर्जुन दोनों दोपहर से ही दूर वाले खेत में काम करने गए हुए थे और उस समय तक वापस नहीं लौटे थे। ठीक उसी समय इंदु के घर के दरवाजे पर उसकी बचपन की सहेली और सहपाठी भारती आकर खड़ी होती है। भारती इंदु की सबसे पक्की और घनिष्ठ सहेली थी। दोनों ने एक साथ स्कूल में पढ़ाई की थी।
आज १ मार्च को भारती का जन्मदिन था। भारती बहुत खुश थी और वह इंदु का हाथ पकड़कर कहती है कि इंदु देख, आज मेरा जन्मदिन है और मैंने अपने घर पर एक छोटी सी पार्टी रखी है, तुझे मेरे साथ अभी मेरे घर चलना पड़ेगा। लेकिन इंदु का मन कहीं आने-जाने का नहीं था। इंदु उदास मन से मना करते हुए कहती है कि भारती, तेरा घर यहां से डेढ़ किलोमीटर दूर खेतों के बीच में बना हुआ है, अब शाम ढल रही है और मैं इतनी रात को तेरे घर नहीं जा सकती, मुझे माफ कर दे।
परंतु भारती जिद पर अड़ जाती है और कहती है कि तू मना नहीं कर सकती, तू मेरे साथ चल, पार्टी खत्म होते ही मैं खुद तुझे तेरे घर तक छोड़ने आऊंगी या फिर तेरे भाई अर्जुन को फोन कर दूंगी, वह तुझे बाइक से लिवा ले जाएगा। इंदु फिर भी संकोच कर रही थी, तभी वहां खड़ी मां सरस्वती दोनों की बातें सुन लेती हैं। सरस्वती देवी सोचती हैं कि पिछले पंद्रह दिनों से इंदु घर में घुट रही है और उदास रहती है, सहेली के जन्मदिन में जाएगी तो शायद इसका मन थोड़ा बहल जाएगा और यह मुस्कुराने लगेगी।
सरस्वती अपनी बेटी इंदु से कहती हैं कि बेटी इंदु, तेरी सहेली इतने प्यार से बुलाने आई है, तू चली जा, थोड़ा मन बदल जाएगा। और भारती तू इसे ध्यान से ले जा और काम होते ही अर्जुन को फोन कर देना, वह इसे ले आएगा। मां के कहने पर इंदु तैयार हो जाती है और अपनी सहेली भारती का हाथ पकड़कर उसके घर की तरफ पैदल ही निकल पड़ती है।
जब भारती और इंदु दोनों लड़कियां बातें करती हुई गांव के बाहरी रास्ते से भारती के घर की तरफ जा रही थीं, तो उसी समय गांव के मोड़ पर खड़े संजू की नजर उन दोनों पर पड़ जाती है। संजू देखता है कि इंदु अपनी सहेली भारती के साथ अकेले खेतों वाले रास्ते पर जा रही है। संजू के मन में तुरंत शैतानी विचार आता है। वह अपनी जेब से मोबाइल निकालता है और पिंटू के पास फोन मिलाकर कहता है कि पिंटू भाई, आज फिर से शिकार सामने है, राजवीर की बेटी इंदु अपनी सहेली भारती के साथ खेतों वाले रास्ते से जा रही है।
पिंटू फोन पर यह सुनते ही कमीनी हंसी हंसता है और कहता है कि संजू तू वहीं रुक, मैं अभी अपनी बाइक से तेरे पास पहुंचता हूं, आज फिर से इस लड़की का घमंड तोड़ेंगे। कुछ ही मिनटों में पिंटू अपनी मोटरसाइकिल लहराता हुआ संजू के पास पहुंच जाता है। दोनों आपस में बात करने लगते हैं। संजू कहता है कि शायद भारती का जन्मदिन है, इसलिए इंदु उसके घर जा रही है। पिंटू आंख मटकाते हुए कहता है कि आज हमारे पास फिर से बहुत शानदार मौका है, आज रात हम इस लड़की के साथ दोबारा म//जा करेंगे।
पिंटू अपनी जेब से पैसों की गड्डी निकालता है और कुछ हजार रुपये संजू के हाथ में थमाते हुए कहता है कि संजू, तू तुरंत दौड़कर ठेके पर जा, वहां से तीन-चार बोतल बी//य//र और श//रा//ब खरीद ले और साथ में कुछ खाने-पीने का सामान भी ले आ। जैसे ही अंधेरा गहराएगा और यह लड़की वापस लौटेगी, हम रास्ते में ही अपना काम शुरू कर देंगे। संजू पैसे लेकर मोटरसाइकिल से पास के अंग्रेजी श//रा//ब के ठेके पर जाता है, वहां से बी//य//र की बोतलें, नमकीन और भुजिया खरीदता है और वापस पिंटू के पास आ जाता है। इसके बाद दोनों नीच दोस्त ईख के खेत के किनारे बैठकर बी//य//र की बोतलें उड़ेलने लगते हैं और न//शे में पूरी तरह धुत हो जाते हैं।
अध्याय ८: दरिंदों का जमावड़ा और हैवानियत की इंतेहा
दूसरी तरफ भारती के घर पर जन्मदिन का उत्सव बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। भारती के परिवार वाले इंदु का बहुत स्वागत करते हैं। केक काटा जाता है, इंदु भी कुछ पलों के लिए अपना सारा दर्द भूलकर अपनी सहेली के साथ हंसने-मुस्कुराने लगती है। देखते ही देखते घड़ी में रात के साढ़े आठ बज जाते हैं। चारों तरफ घना अंधेरा छा जाता है। इंदु को चिंता होने लगती है और वह भारती से कहती है कि भारती, अब बहुत देर हो चुकी है, मुझे अपने घर जाना चाहिए, मेरे माता-पिता परेशान हो रहे होंगे।
भारती कहती है कि हां चल इंदु, मैं तुझे गांव के मोड़ तक छोड़ आती हूं। इसके बाद भारती और इंदु दोनों घर से बाहर निकलती हैं और सुनसान पगडंडी पर धीरे-धीरे चलने लगती हैं। परंतु उन्हें क्या मालूम था कि रास्ते में मौत और है//वा//नि//यत उनका इंतजार कर रही थी। जैसे ही दोनों लड़कियां ईख के खेत के पास पहुंचती हैं, न//शे में धुत पिंटू और संजू झाड़ियों के पीछे से अचानक बाहर निकल आते हैं और दोनों का रास्ता रोक लेते हैं।
पिंटू जब देखता है कि इंदु के साथ भारती भी है, तो वह संजू से कहता है कि अरे, आज तो इसके साथ इसकी सहेली भारती भी है! संजू ह//व//स भरे स्वर में कहता है कि इससे क्या फर्क पड़ता है भाई, आज एक के साथ एक फ्री है, दोनों का म//जा लेंगे। इतना कहते ही पिंटू और संजू अपनी जेबों से धारदार चा//कू निकाल लेते हैं और एक झटके में दोनों लड़कियों की गर्दन पर चा//कू की नोक टिका देते हैं।
पिंटू दहाड़ते हुए ध//म//की देता है कि अगर किसी ने भी ची//ख//ने या चिल्लाने की कोशिश की तो एक सेकंड में गर्दन धड़ से अलग कर दूंगा। चा//कू की ठंडी धार अपनी गर्दन पर महसूस करते ही भारती और इंदु खौफ से थर-थर कांपने लगती हैं। वे समझ जाती हैं कि ये दोनों लड़के श//रा//ब के न//शे में पूरी तरह अंधे हो चुके हैं और जरा सी आवाज करने पर सचमुच चा//कू चला देंगे। दोनों लड़कियां बेबस होकर खामोश हो जाती हैं। पिंटू और संजू चा//कू की नोक पर उन दोनों लड़कियों को घसीटते हुए रास्ते के किनारे खड़े ईख के घने खेत के अंदर ले जाते हैं।
ईख के खेत के गहरे अंधेरे में ले जाकर पिंटू और संजू फिर से अपनी है//वा//नि//यत का नंगा नाच शुरू कर देते हैं। वे दोनों बारी-बारी से इंदु और भारती के साथ बेहद गं//दा और ग//लत का//म करते हैं। दोनों मासूम लड़कियां गिड़गिड़ाती रहती हैं, रोती रहती हैं, परंतु उन दरिंदों पर कोई असर नहीं होता। जब पिंटू और संजू दोनों थक जाते हैं, तो कहानी यहीं समाप्त नहीं होती, बल्कि असली क्रूरता की शुरुआत होती है।
संजू अपनी जेब से फोन निकालता है और अपने दो अन्य आवारा दोस्तों मोनू और रिंकू को कॉल लगाता है। संजू फोन पर हंसते हुए कहता है कि मोनू भाई, तुम दोनों कहां मर रहे हो, तुरंत ईख वाले खेत के पास आओ, आज हमारे हाथ दो-दो सुंदर लड़कियां लगी हैं, हम तो म//जा ले चुके हैं, अब तुम दोनों भी आ जाओ और अपनी रात रंगीन कर लो। मोनू और रिंकू यह सुनते ही खुशी से उछल पड़ते हैं और संजू से सटीक लोकेशन पूछते हैं।
संजू उन्हें खेत का पता बताता है और कुछ ही देर में मोनू और रिंकू अपनी मोटरसाइकिल से बताए हुए स्थान पर पहुंच जाते हैं। खेत के अंदर घुसकर जब मोनू और रिंकू देखते हैं कि दो लड़कियां रोती हुई जमीन पर बैठी हैं और उनकी गर्दन पर चा//कू रखा हुआ है, तो रिंकू लालची नजरों से देखते हुए कहता है कि यार, लड़कियां तो बहुत खूबसूरत हैं, लेकिन अगर साथ में थोड़ी श//रा//ब और मिल जाती तो म//जा दोगुना हो जाता।
पिंटू तुरंत कहता है कि ठेका पास में ही है, संजू तू फिर से जा और दो-चार बोतल श//रा//ब और ले आ। संजू दोबारा बाइक उठाकर जाता है और श//रा//ब की नई बोतलें खरीद लाता है। इसके बाद ईख के खेत के बीचों-बीच बैठकर चारों दरिंदे पिंटू, संजू, मोनू और रिंकू श//रा//ब की बोतलें खाली करने लगते हैं। लगभग आधा घंटा बीत जाता है और चारों राक्षस पूरी तरह होश खो बैठते हैं।
इसके बाद मोनू और रिंकू भी बारी-बारी से इंदु और भारती के साथ भ//या//नक ग//लत का//म करते हैं और अपनी है//वा//नि//यत मिटाते हैं। जब चारों का मन भर जाता है, तो वे फिर से पिंटू और संजू के साथ मिलकर दोनों लड़कियों के साथ दोबारा बदतमीजी करते हैं। रात के लगभग पौने दस बज चुके थे। चारों लड़के बिना किसी पछतावे के दोनों लड़कियों को लात मारकर गिराते हैं और भ//या//नक ध//म//की देते हैं कि अगर तुम दोनों ने इस घटना के बारे में अपने घरवालों या किसी को भी बताया तो तुम्हारे पूरे खानदान को चुन-चुनकर मा//र डालेंगे और तुम्हारी ला//शों को इसी ईख के खेत में गा//ड़ देंगे। यह ध//म//की देकर चारों दरिंदे अपनी मोटरसाइकिलों पर सवार होते हैं और वहां से ठहाके लगाते हुए फरार हो जाते हैं।
अध्याय ९: अंधेरे रास्ते पर खोज और सच का भयावह विस्फोट
उन राक्षसों के जाने के बाद भारती और इंदु किसी तरह ईख के खेत से बाहर निकलती हैं। उनके कपड़े फटे हुए थे, शरीर पर चोटों के निशान थे और आंखें आंसुओं से सूज चुकी थीं। दोनों लड़कियां एक-दूसरे का सहारा बनकर रोते-बिलखते हुए इंदु के घर की तरफ बढ़ने लगती हैं। दूसरी तरफ रात के दस बज चुके थे। इंदु के घर न लौटने पर अर्जुन चिंतित होकर अपनी मोटरसाइकिल निकालता है और भारती के घर पहुंचता है।
परंतु भारती के माता-पिता बताते हैं कि भारती और इंदु तो रात आठ बजे ही घर से निकल गई थीं। अर्जुन घबरा जाता है। वह पूरे गांव और रास्तों पर अपनी बहन की तलाश करने लगता है। भटकते-भटकते जब अर्जुन खेतों वाले रास्ते पर पहुंचता है, तो उसे दूर से दो धुंधली आकृतियां धीरे-धीरे आती हुई दिखाई देती हैं। अर्जुन पास जाकर हेडलाइट की रोशनी में देखता है कि वह उसकी बहन इंदु और उसकी सहेली भारती हैं।
अर्जुन दोनों की हालत देखकर हैरान रह जाता है। उनके कपड़े फटे हुए थे और वे बिलख-बिलखकर रो रही थीं। अर्जुन मोटरसाइकिल रोककर पूछता है कि इंदु, भारती, क्या हुआ तुम दोनों इस हालत में क्यों हो? इंदु कुछ नहीं बोल पाती, बस अर्जुन के गले लगकर रोने लगती है। अर्जुन कहता है कि शांत हो जाओ, दोनों बाइक पर बैठो, पहले घर चलो, घर चलकर बात करते हैं। अर्जुन दोनों लड़कियों को मोटरसाइकिल पर बैठाकर अपने घर ले आता है।
घर पहुंचते ही इंदु और भारती आंगन में गिर पड़ती हैं और राजवीर सिंह तथा मां सरस्वती के सामने हाथ जोड़कर फूट-फूटकर रोना शुरू कर देती हैं। राजवीर सिंह घबराकर अपनी बेटी को उठाते हैं और पूछते हैं कि बेटी, क्या बात है, इतनी रात को तुम दोनों इस हालत में क्यों रो रही हो? रोते-बिलखते हुए भारती हिम्मत जुटाती है और राजवीर तथा अर्जुन के सामने पूरी सत्यता बयां कर देती है कि काका, आज रास्ते में पिंटू, संजू, मोनू और रिंकू इन चारों ने हमें चा//कू दिखाकर ईख के खेत में खींच लिया और हम दोनों के साथ बहुत गं//दा और ग//लत का//म किया है, वे चार-चार घंटे तक हमारे साथ है//वा//नि//यत करते रहे।
यह सुनते ही राजवीर सिंह के सिर पर मानो बिजली गिर पड़ती है और अर्जुन का चेहरा गुस्से से भ//या//नक काला पड़ जाता है, उसकी आंखें अंगारे की तरह जलने लगती हैं। तभी मां सरस्वती भी अपना संयम खो देती हैं और रोती हुई चिल्लाकर कहती हैं कि हां राजवीर, आज से पंद्रह दिन पहले भी जब इंदु खेत में खाना देने जा रही थी, तब भी इस पिंटू और संजू ने हमारी बेटी के साथ ईख के खेत में ग//लत का//म किया था, मैंने अपनी इज्जत और अर्जुन की जान बचाने के डर से तुम दोनों से यह बात छुपाई थी!
सरस्वती की यह बात सुनते ही राजवीर सिंह अपनी पत्नी पर गरज उठते हैं और कहते हैं कि तूने यह बात छुपाकर सबसे बड़ा गु//ना//ह किया, अगर तू उसी दिन बताती तो आज हमारी बेटी और भारती के साथ यह भ//या//नक कांड न होता!
अध्याय १०: खून की ज्वाला और गंडासी की धार
अब अर्जुन के सिर पर गंडासी की तरह खून सवार हो चुका था। उसकी मासूम बहन की अस्मत लू//ट ली गई थी और वह भी दो-दो बार! अर्जुन का स्वाभिमान, उसका भ्रातृ-प्रेम और उसका पौरुष ज्वाला बनकर भड़क उठा। अर्जुन बिना एक शब्द बोले सीधे घर के भीतर बने स्टोर रूम में जाता है और वहां रखी हुई लोहे की भारी गं//डा//सी उठा लेता है। गं//डा//सी की धार बहुत तेज थी और रोशनी में चमक रही थी।
राजवीर सिंह भी अपनी लाचारी, अपमान और बेबसी के दर्द में अंधे हो चुके थे। वे घर के कोने में रखा हुआ एक मजबूत मोटा ला//ठी उठा लेते हैं। मां सरस्वती और इंदु रोती रह जाती हैं, पैरों में गिरती हैं, लेकिन बाप-बेटे के सिर पर प्रतिशोध का भूत सवार था। रात के लगभग साढ़े दस बजे राजवीर सिंह और अर्जुन घर से बाहर निकलते हैं। अर्जुन मोटरसाइकिल स्टार्ट करता है और अपने पिता को पीछे बैठाकर चारों दरिंदों की तलाश में गांव की गलियों और मुख्य सड़कों पर चक्कर लगाने लगता है।
अर्जुन लगभग एक घंटे तक गांव के हर संभावित ठिकाने, चौरस्तों और अखाड़ों पर उन्हें ढूंढता है, परंतु चारों में से कोई भी नजर नहीं आता। रात के ग्यारह बज चुके थे और चारों तरफ सन्नाटा छा चुका था। थक-हारकर जब अर्जुन और राजवीर सिंह निराश होकर अपने घर की तरफ लौट रहे थे, तभी सड़क के मोड़ पर अर्जुन की नजर संजू पर पड़ती है।
संजू अपनी मोटरसाइकिल पर श//रा//ब के ठेके से बोतलें खरीदकर अपने ट्यूबवेल के कमरे की तरफ जा रहा था। संजू को देखते ही अर्जुन अपने पिता से कहता है कि पिताजी, संजू अपने खेत वाले ट्यूबवेल पर गया है, पक्का उसके बाकी तीनों दोस्त भी वहीं बैठकर श//रा//ब पी रहे होंगे। राजवीर कहते हैं कि गाड़ी उसके पीछे लगा दे। अर्जुन तुरंत संजू की मोटरसाइकिल के पीछे अपनी बाइक दौड़ा देता है।
अध्याय ११: ट्यूबल पर नरसंहार और चार लाशों की सेज
लगभग सात-आठ मिनट के भीतर संजू अपने ट्यूबवेल के कमरे के पास पहुंचता है और बाइक खड़ी करके अंदर चला जाता है। अर्जुन और राजवीर सिंह अपनी मोटरसाइकिल की लाइट बंद करके दबे पांव ट्यूबवेल के पास पहुंचते हैं। ट्यूबवेल के बाहर बने खुले छप्पर में पीला बल्ब जल रहा था और वहां का दृश्य देखकर अर्जुन का खून उबल पड़ता है।
चारों राक्षस पिंटू, संजू, मोनू और रिंकू गोल घेरा बनाकर बैठे हुए थे। सामने श//रा//ब की बोतलें और बी//य//र के केन बिखरे पड़े थे और वे चारों ठहाके लगाकर इंदु और भारती के साथ की गई अपनी है//वा//नि//यत की डींगें हांक रहे थे। चारों श//रा//ब के न//शे में पूरी तरह धुत थे। अर्जुन के हाथ में गं//डा//सी कसी हुई थी। वह बिना कोई आहट किए पीछे से झपटता है और सीधे पिंटू के सिर पर गं//डा//सी का पहला जोरदार वार कर देता है।
गं//डा//सी की धार पिंटू की खोपड़ी को चीर देती है और पिंटू ची//ख भी नहीं पाता, वहीं खून के फव्वारे के बीच जमीन पर गिरकर तड़पने लगता है। अर्जुन बिना रुके पिंटू के सिर और गर्दन पर तीन-चार बार लगातार गं//डा//सी से वार करता है, जिससे पिंटू मौके पर ही अपना दम तोड़ देता है। पिंटू को मा//र//ते देख संजू खड़ा होने की कोशिश करता है, लेकिन अर्जुन पलक झपकते ही संजू की तरफ लपकता है और संजू की गर्दन पर गं//डा//सी का करारा प्रहार कर देता है।
संजू की गर्दन आधी कट जाती है, वह जमीन पर गिरकर हाथ-पैर मारने लगता है। अर्जुन राक्षसों की तरह संजू के हाथ, कान और पैर पर गं//डा//सी से ताबड़तोड़ वार करके उसे काट डालता है और संजू भी वहीं ढेर हो जाता है। दूसरी तरफ राजवीर सिंह अपने पूरे बल के साथ ला//ठी लेकर मोनू पर टूट पड़ते हैं। राजवीर सिंह मोनू की छाती और सिर पर ला//ठी से दर्जनों वार करते हैं। मोनू की पसलियां टूट जाती हैं और सिर फटने से उसका अत्यधिक रक्तस्राव हो जाता है, जिससे मोनू भी वहीं मौके पर दम तोड़ देता है।
चौथा लड़का रिंकू जो थोड़ा पीछे बैठा था, इस भ//या//नक मंजर को देखकर उसका न//शा हिरन हो जाता है। वह डर के मारे ची//ख//ता हुआ भागकर ट्यूबवेल के पक्के कमरे के अंदर घुस जाता है और अंदर से कुंडी बंद कर लेता है। रिंकू अंदर कांपते हुए अपनी जान की भीख मांगने लगता है। परंतु अर्जुन के सिर पर प्रतिशोध का भूत सवार था। अर्जुन और राजवीर सिंह मिलकर कमरे के लकड़ी के दरवाजे पर लातों और गं//डा//सी से प्रहार करने लगते हैं।
दो मिनट के भीतर मजबूत दरवाजा टूटकर बिखर जाता है। अर्जुन कमरे के अंदर घुसता है, रिंकू कोने में हाथ जोड़कर गिड़गिड़ा रहा होता है कि मुझे माफ कर दो भैया! लेकिन अर्जुन बिना कोई दया दिखाए रिंकू की गर्दन और पेट में गं//डा//सी उतार देता है। रिंकू का शरीर ख़ू//न से लथपथ होकर शांत हो जाता है। महज पंद्रह मिनट के भीतर बाप और बेटे ने मिलकर अपनी बेटी और बहन की इज्जत का बदला लेते हुए चारों नरपिशाचों की ला//शैं बिछा दी थीं। चारों दरिंदे अपने ही ख़ू//न के पोखरे में बेजान पड़े हुए थे।
अध्याय १२: थाने में आत्मसमर्पण और कानून का कटघरा
इस भ//या//नक हत्याकांड को अंजाम देने के बाद अर्जुन अपनी ख़ू//न से सनी गं//डा//सी को वहीं कपड़े से पोंछता है और अपने पिता राजवीर सिंह के साथ मोटरसाइकिल पर बैठता है। रात के लगभग एक बज चुके थे। अर्जुन मोटरसाइकिल सीधे नजदीकी बहसुमा पुलिस स्टेशन के दरवाजे पर जाकर खड़ी कर देता है।
अर्जुन और राजवीर सिंह शांत कदमों से थाने के भीतर प्रवेश करते हैं। ड्यूटी पर तैनात सिपाही और थाना प्रभारी उन्हें देखकर चौंक जाते हैं क्योंकि अर्जुन के कपड़ों और हाथों पर ख़ू//न के सूखे धब्बे लगे हुए थे। अर्जुन बिना किसी डर या झिझक के अपनी गं//डा//सी टेबल पर रखता है और पुलिस अधिकारियों के सामने सरेंडर करते हुए कहता है कि साहब, हमने गांव के पिंटू, संजू, मोनू और रिंकू इन चारों को मा//र दिया है, उनकी ला//शैं ट्यूबवेल पर पड़ी हैं।
जब थाना प्रभारी कड़क आवाज में पूछता है कि तुम लोगों ने ऐसा खौफनाक कदम क्यों उठाया, तो राजवीर सिंह और अर्जुन रोते हुए अपनी मासूम बेटी इंदु और उसकी सहेली भारती के साथ हुई दो-दो बार की भ//या//नक है//वा//नि//यत और दरिंदगी की पूरी दास्तान बयान कर देते हैं। पुलिस अधिकारी जब उस मासूम लड़की पर हुए अत्याचार और बाप-बेटे के इस प्रतिशोध की कहानी सुनते हैं, तो उनके भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं और वे सन्न रह जाते हैं।
घटना की गंभीरता को देखते ही थाना प्रभारी तुरंत भारी पुलिस बल के साथ देर रात ही घटनास्थल यानी ट्यूबवेल पर पहुंचते हैं। वहां का मंजर देखकर पुलिसकर्मियों की रूह कांप जाती है। चारों लड़कों के शव ख़ू//न से लथपथ पड़े हुए थे। पुलिस तुरंत चारों शवों को अपने कब्जे में लेती है, पंचनामा भरकर पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल मेरठ भिजवा देती है।
अगले दिन सुबह यह खबर पूरे मेरठ जिले और उत्तर प्रदेश में आग की तरह फैल जाती है। गांव में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया जाता है। पुलिस राजवीर सिंह और उनके बेटे अर्जुन के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की प्रासंगिक धाराओं के तहत हत्या का मुकदमा दर्ज करके चार्जशीट न्यायालय में दाखिल कर देती है।
उपसंहार: समाज के समक्ष खड़े अनसुलझे प्रश्न
आज राजवीर सिंह और उनका बेटा अर्जुन जेल की सलाखों के पीछे हैं और यह मामला अदालत में विचाराधीन है। यह बात भविष्य के गर्भ में छिपी हुई है कि माननीय न्यायाधीश महोदय कानून के पन्नों को देखकर अर्जुन और राजवीर सिंह को क्या सजा सुनाते हैं या उनकी परिस्थितियों को देखकर क्या निर्णय लेते हैं।
परंतु इस पूरी घटनाक्रम ने पूरे समाज को हिलाकर रख दिया है। एक तरफ जहां कानून को अपने हाथ में लेना अपराध माना जाता है, वहीं दूसरी तरफ अपनी बेटी और बहन की अस्मत पर हुए इतने बड़े अत्याचार के बाद एक पिता और भाई का यह कदम समाज के सामने कई कड़े सवाल खड़े करता है। इस दुखद और सत्य घटना पर आपकी क्या राय है? क्या अर्जुन और उसके पिता राजवीर सिंह ने जो किया वह सही था या गलत? कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर लिखें।
मिलते हैं दोस्तों किसी ऐसी ही सामाजिक और सत्य घटनाक्रम के साथ, तब तक के लिए जय हिंद, वंदे मातरम।