पत्नी की एक गलती की वजह से पति ने कर बहुत बड़ा कांड/ – News

पत्नी की एक गलती की वजह से पति ने कर बहुत बड़ा कांड/

पत्नी की एक गलती की वजह से पति ने कर बहुत बड़ा कांड/

पति की एक गलती की वजह से पति ने किया बहुत बड़ा कांड: बागपत का खौफनाक हत्याकांड

प्रस्तावना: अहेरा गाँव का इतिहास और गगन सिंह का अतीत

उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक और कृषि-प्रधान जिले बागपत की सरजमीं अपने अनुशासित देहाती माहौल, लहलहाते गन्ने के खेतों और सीधे-सादे जीवन के लिए जानी जाती है। इसी बागपत जिले के अंतर्गत बसा हुआ है एक शांत और प्राचीन गाँव—अहेरा। अहेरा गाँव की मुख्य पहचान यहाँ के मेहनती किसान और उनकी सदियों पुरानी ग्रामीण परंपराएँ रही हैं। गाँव के मुहाने पर मिट्टी के पक्के बने घर, चौपाल पर हुक्के की गुड़गुड़ाहट और भोर की पहली किरण के साथ खेतों की ओर रुख करते किसान इस गाँव की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा थे।

इसी अहेरा गाँव में रहता था गगन सिंह। गगन सिंह गाँव का एक आर्थिक रूप से सक्षम और प्रतिष्ठित किसान माना जाता था। उसके पास अपनी पैतृक ६ एकड़ बेहद उपजाऊ कृषि भूमि थी। गगन सिंह ने अपनी जवानी के दिनों में रात-दिन एक करके खेती-किसानी का काम किया था। गन्ने, गेहूं और सरसों की बंपर पैदावार बेचकर उसने न केवल अपने लिए एक पक्का आलीशान मकान बनवाया था, बल्कि बैंक और घर में अच्छे-खासे पैसे भी जोड़ रखे थे। गाँव के लोग गगन सिंह की मेहनत और उसके आर्थिक रुतबे का सम्मान किया करते थे।

लेकिन वक्त की लाठी जब पड़ती है, तो इंसान का जीवन पूरी तरह बदल जाता है। लगभग ७ साल पहले गगन सिंह की धर्मपत्नी का अचानक बीमारी के कारण देहांत हो गया। पत्नी के चले जाने के बाद गगन सिंह के जीवन में एक गहरा सन्नाटा और अकेलापन छा गया। घर की चौखट पर खुशियाँ बिखेरने वाली जीवनसंगिनी के बिना गगन सिंह अंदर से टूट गया।

परंतु इस आघात का प्रभाव गगन सिंह के चरित्र पर बहुत ही विपरीत और विकृत रूप में पड़ा। पत्नी की मौत के बाद गगन सिंह की सोच और आचरण में भारी गिरावट आने लगी। वह धीरे-धीरे गाँव के सीधे-सादे रास्तों से भटककर /अ/नै/ति/क/ और /च/रि/त्र/ही/न/ गतिविधियों की ओर प्रवृत्त होने लगा। वह एक ऐसा व्यक्ति बन चुका था जो समाज की मर्यादाओं की परवाह नहीं करता था और जिसका आचरण पूरी तरह /अ/नै/ति/क/ हो चुका था।

गाँव की गरीब और असहाय महिलाओं को पैसों का लालच देकर या उनकी मजबूरियों का फायदा उठाकर गगन सिंह अक्सर रात के अंधेरे में अपने सुनसान खेतों में ले जाया करता था और उनके साथ अपना समय व्यतीत किया करता था। गाँव के मुहाने पर रात के सन्नाटे में होने वाले इस /अ/म/र्या/दि/त/ आचरण की भनक पूरे गाँव में धीरे-धीरे फैलने लगी थी, लेकिन गगन सिंह के पास धन और जमीन का बल होने के कारण कोई भी उसके मुँह पर कुछ कहने से कतराता था। सबसे बड़ी बात यह थी कि गगन सिंह के अपने घर के सदस्य यानी उसका बेटा इस काले सच से पूरी तरह अनजान था।

अध्याय १: बेटे की बगावत, बेदखली और बदहाली का दौर

गगन सिंह के परिवार में उसका केवल एक इकलौता बेटा था, जिसका नाम था किशन सिंह। किशन सिंह अपने पिता की छाँव में पला-बढ़ा था, लेकिन जैसे-जैसे वह जवान हुआ, उसने अपने पिता के सख्त और अड़ियल मिजाज का सामना किया। किशन सिंह स्वभाव से जिद्दी था और अपने फैसलों में किसी का हस्तक्षेप पसंद नहीं करता था। नियति का खेल ऐसा हुआ कि किशन सिंह भी अपने पिता के नक्शे-कदम पर चलते हुए पारिवारिक मर्यादाओं के खिलाफ खड़ा हो गया।

किशन सिंह को पास के ही एक दूसरे गाँव की एक बेहद सुंदर और सुशील लड़की से प्रेम हो गया। उस लड़की का नाम था ऋतू देवी। ऋतू देखने में इतनी आकर्षक और रूपवती थी कि गाँव का जो भी व्यक्ति उसे देखता, उसकी सुंदरता की तारीफ किए बिना नहीं रह पाता था। ऋतू का संबंध एक साधारण और गरीब परिवार से था।

जब किशन सिंह ने अपने पिता गगन सिंह के सामने ऋतू से शादी करने की इच्छा जाहिर की, तो गगन सिंह सख्त लहजे में भड़क उठा। गगन सिंह का मानना था कि उसका इकलौता बेटा किसी अमीर घराने में शादी करे ताकि उनकी संपत्ति और रुतबा और बढ़ सके। लेकिन किशन सिंह ने अपने पिता की एक न सुनी। पिता की मर्जी के पूरी तरह खिलाफ जाकर किशन सिंह ने ऋतू देवी के साथ मंदिर में शादी कर ली।

जब किशन सिंह अपनी नवविवाहिता पत्नी ऋतू देवी को लेकर अहेरा गाँव स्थित अपने घर पहुँचा, तो गगन सिंह का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। अपने ही बेटे द्वारा अपनी बात न मानने और अपनी पसंद थोपने के कारण गगन सिंह ने उग्र रूप धारण कर लिया। उसने स्पष्ट कह दिया कि इस शादी को वह कभी स्वीकार नहीं करेगा। उसी पल गगन सिंह ने किशन और उसकी नई-नवेली दुल्हन ऋतू देवी को अपने आलीशान घर और ६ एकड़ जमीन से बेदखल कर दिया और उन्हें धक्के देकर घर से बाहर निकाल दिया।

पिता द्वारा बेदखल किए जाने के बाद किशन सिंह के पास रोने या पीछे हटने का समय नहीं था। उसने अपनी पत्नी ऋतू का हाथ थामा और अहेरा गाँव के ही एक अंदरूनी हिस्से में एक छोटा सा कच्चा-पक्का कमरा किराये पर ले लिया। दोनों ने उसी एक कमरे की गृहस्थी में अपनी नई जिंदगी की शुरुआत की।

किशन सिंह ने अपने और अपनी पत्नी के पेट भरने के लिए गाँव से कुछ दूरी पर स्थित एक औद्योगिक कारखाने में दिहाड़ी मजदूर के रूप में काम करना शुरू कर दिया। वह सुबह-सुबह कारखाने जाता और दिनभर पसीना बहाकर जो छोटी-मोटी दिहाड़ी पाता, उससे अपने घर का राशन-पानी चलाता। दूसरी तरफ ऋतू देवी एक समर्पित गृहिणी की तरह घर के कामकाज संभालती, चूल्हा-चौका करती और अपने पति के लौटने का इंतजार करती।

लेकिन वक्त के साथ-साथ उनके जीवन में गरीबी का भयानक साया छाने लगा। कारखाने की सीमित मजदूरी से कमरे का किराया, बिजली का बिल और रोजमर्रा के खाने-पीने का खर्च चलाना बेहद मुश्किल होता जा रहा था। पिता गगन सिंह के पास अकूत संपत्ति और पैसा था, लेकिन उसने अपने बेटे और बहू को एक फूटी कौड़ी भी देने से साफ इनकार कर दिया था। गरीबी की इस चक्की में पिसते हुए किशन सिंह और ऋतू देवी दोनों ही अंदर से बेहद परेशान और उदास रहने लगे थे।

अध्याय २: गरीबी का साया और दो लाख रुपयों की दरकार

जैसे-जैसे दिन बीतते गए, घर की आर्थिक तंगी विकराल रूप धारण करने लगी। ऋतू देवी रोज शाम को जब अपने पति किशन को थका-हारा और निराश घर लौटते देखती, तो उसका दिल बैठ जाता था। ऋतू एक समझदार और स्वाभिमानी महिला थी। वह समझ चुकी थी कि केवल किशन की दिहाड़ी मजदूरी के भरोसे न तो उनका वर्तमान सुधर सकता है और न ही भविष्य के लिए कोई बचत हो सकती है।

एक दिन शाम के समय, जब किशन कारखाने से लौटकर थका हुआ बैठा था, तब ऋतू उसके पास आई और बड़े ही ठंडे तथा आत्मीय स्वर में बोली, “सुनिए जी, इस तरह कब तक चलेगा? आप दिन-रात कारखाने में मेहनत करते हैं, लेकिन जो भी कमाई घर आती है, वह कमरे के किराये और राशन में खत्म हो जाती है। हमारे पास भविष्य के लिए एक रुपया भी नहीं बचता। अगर कल को कोई बीमारी या मुसीबत आ गई, तो हम क्या करेंगे?”

किशन ने एक गहरी सांस ली और कहा, “ऋतू, मैं क्या करूँ? जितनी मेरी हिम्मत है, उतना काम करता हूँ। पिताजी ने हमें बेदखल कर दिया है, वरना आज हमें यह दिन न देखना पड़ता।”

ऋतू ने किशन के हाथ पर अपना हाथ रखते हुए कहा, “मैं आपके कंधे से कंधा मिलाकर काम करना चाहती हूँ। मैं घर में खाली बैठकर आपकी लाचारी नहीं देख सकती। मैं भी कुछ छोटा-मोटा काम धंधा शुरू करना चाहती हूँ।”

किशन ने आश्चर्य से ऋतू की तरफ देखा और पूछा, “यह तो बहुत अच्छी बात है ऋतू, लेकिन तुम गाँव में रहकर क्या काम करोगी? तुम्हें कौन सा काम धंधा पसंद है?”

ऋतू ने अपनी योजना बताते हुए कहा, “हमारे गाँव में पशुपालन का काम बहुत अच्छा चलता है। अगर हम दो अच्छी नस्ल की दूध देने वाली भैंसें खरीद लें, तो मैं दिनभर घर पर रहकर उनकी देखभाल करूँगी। उनका चारा-पानी सँभालूँगी और जितना भी दूध निकलेगा, उसे गाँव की डेयरी में बेचकर हर महीने अच्छे-खासे पैसे घर आ सकते हैं। इससे हमारी गरीबी दूर हो जाएगी और हम अपने पैरों पर खड़े हो जाएँगे।”

किशन सिंह को अपनी पत्नी ऋतू की यह योजना बहुत व्यावहारिक और पसंद आई। लेकिन अगले ही पल उसके चेहरे पर उदासी छा गई। किशन ने कहा, “योजना तो तुम्हारी बहुत बढ़िया है ऋतू, लेकिन दो अच्छी भैंसें खरीदने के लिए कम से कम दो लाख रुपयों की जरूरत होगी। इतने पैसे हमारे पास कहाँ हैं? हमारी जेब तो बिल्कुल खाली है।”

ऋतू ने थोड़ा सोचते हुए सुझाव दिया, “देखिए, आपके पिताजी गगन सिंह के पास बहुत पैसा है। उन्होंने भले ही आपको घर से निकाल दिया हो, लेकिन आप उनके इकलौते बेटे हैं। आप एक बार उनके पास जाइए और उनसे ₹२ लाख रुपये कर्ज के रूप में माँग लीजिए। उनसे कहिए कि हम ब्याज समेत धीरे-धीरे करके उनके सारे पैसे चुका देंगे। आखिर वह पिता हैं, क्या उनका दिल अपने बेटे के लिए नहीं पसीजेगा?”

किशन सिंह पहले तो झिझका, लेकिन गरीबी के दबाव और पत्नी के समझाने पर वह मान गया। उसने कहा, “ठीक है, तुम सही कह रही हो। मैं पिताजी से जाकर बात करता हूँ।”

शाम के करीब ५:०० बजे का वक्त था। सूरज ढल रहा था। किशन सिंह अपने किराये के कमरे से निकला और अपने पिता गगन सिंह के आलीशान घर की ओर चल दिया। घर पहुँचकर किशन ने अपने पिता से मुलाकात की और संकोच के साथ कहा, “पिताजी, मुझे ₹२ लाख रुपये कर्ज के रूप में चाहिए। मैं दो भैंसें खरीदना चाहता हूँ ताकि मेरी पत्नी दूध का छोटा सा व्यापार कर सके और हमारे घर का गुज़ारा ठीक से चल सके। मैं आपके एक-एक रुपये का कर्ज चुका दूँगा।”

लेकिन गगन सिंह का दिल तो जैसे पत्थर का बन चुका था। अपने बेटे की बेबसी देखकर भी उसका दिल नहीं पिघला। गगन सिंह ने कड़े और कठोर लहजे में चिल्लाते हुए कहा, “तुम ₹२ लाख रुपये की बात करते हो? तुमने मेरी मर्जी के बिना शादी की थी, मेरी बात ठुकराई थी। अब मेरे दर पर भीख माँगने आए हो? मैं तुम्हें ₹२ लाख तो क्या, एक फूटी कौड़ी भी नहीं दूँगा! दोबारा यहाँ पैसे माँगने मत आना!”

अपने ही पिता के इस कठोर और अपमानजनक रवैये से किशन सिंह का दिल टूट गया। वह थक-हारकर, खाली हाथ नीची गर्दन किए अपने किराये के कमरे पर वापस लौट आया।

घर पहुँचकर किशन ने उदास मन से ऋतू को पूरी बात बताई, “पिताजी ने साफ मना कर दिया ऋतू। उन्होंने कहा कि वह मुझे एक फूटी कौड़ी भी नहीं देंगे।”

ऋतू देवी ने अपने पति को ढारस बँधाते हुए कहा, “आप निराश मत होइए। शायद आपके जाने से उनका गुस्सा भड़क गया हो। अगर उन्होंने आपको मना कर दिया है, तो एक बार मैं खुद जाकर उनसे बात करके देखती हूँ। आखिर मैं उनकी बहू हूँ, शायद मेरी बात सुनकर उनका दिल पिघल जाए।”

किशन सिंह ने कहा, “ठीक है, तुम अपनी मर्जी से एक बार कोशिश करके देख लो। अगर वह पैसे दे देते हैं, तो बहुत अच्छी बात होगी।”

अध्याय ३: ससुर की /अ/नै/ति/क/ शर्त और बहू का इंकार

शाम के ढलते ही गाँव में अंधेरा घिरने लगा था। घड़ी में शाम के करीब ७:०० बजे का वक्त हो चुका था। ऋतू देवी ने अपने सिर पर पल्लू ठीक किया और अपने ससुर गगन सिंह के घर की ओर कदम बढ़ा दिए। कुछ ही देर में वह गगन सिंह के पक्के मकान के मुख्य दरवाजे पर खड़ी थी।

ऋतू ने धड़कते दिल के साथ दरवाजे पर हल्की सी दस्तक दी। अंदर से पैरों की आहट हुई और कुछ ही पलों में गगन सिंह ने लकड़ी का भारी दरवाजा खोला।

जैसे ही दरवाजा खुला, गगन सिंह की नजरें सामने खड़ी अपनी बहू ऋतू देवी पर पड़ीं। उस वक्त गगन सिंह की आँखें जैसे थम सी गईं। ऋतू देवी की गठीली काया, उसका खूबसूरत चेहरा और उसकी सादगी को गगन सिंह ऊपर से नीचे तक अपनी हवस भरी नजरों से ताकने लगा। पत्नी की मौत के बाद से वैसे भी गगन सिंह का आचरण पूरी तरह /अ/नै/ति/क/ और /च/रि/त्र/ही/न/ हो चुका था। अपनी ही सगी पुत्रवधू की सुंदरता को देखकर उसके अंदर का दानव जाग उठा।

गगन सिंह के चेहरे पर एक कुटिल मुस्कान तैर गई। उसने बड़े ही मिठास भरे लहजे में कहा, “अरे ऋतू! तुम? इतने दिनों बाद मेरे घर पर आई हो। अंदर आओ, बाहर क्यों खड़ी हो?”

ऋतू देवी बिना कुछ सोचे-समझे घर के अंदर दाखिल हो गई। गगन सिंह ने तुरंत मुख्य दरवाजा अंदर से बंद कर लिया।

घर के आंगन में खड़े होकर ऋतू देवी ने हाथ जोड़कर सीधे मुद्दे की बात कही, “पिताजी, मुझे और आपके बेटे को इस वक्त ₹२ लाख रुपयों की बहुत सख्त जरूरत है। हम दो अच्छी भैंसें खरीदना चाहते हैं ताकि उनका दूध बेचकर हम अपने घर की भयानक गरीबी को दूर कर सकें और अपना जीवन ठीक से गुजार सकें। आप हमें ₹२ लाख रुपये उधार दे दीजिए, हम धीरे-धीरे करके आपके सारे पैसे लौटा देंगे।”

गगन सिंह ने ऋतू की तरफ एक कदम बढ़ाया और अपनी आँखों में चमक लाते हुए कहा, “ऋतू, तुम ₹२ लाख रुपये की बात करती हो? मैं तुम्हें ₹२ लाख रुपये जरूर दे सकता हूँ। मेरे पास पैसों की कोई कमी नहीं है। लेकिन… उसकी एक कीमत होगी, जो तुम्हें चुकानी पड़ेगी।”

ऋतू देवी ससुर के इस अचानक बदले हुए सुर को सुनकर चौंक गई। वह चुपचाप खड़ी रहकर सोचने लगी कि ससुर जी किस कीमत की बात कर रहे हैं।

तब गगन सिंह ने बिना किसी शर्म और संकोच के सीधे शब्दों में अपना घटिया प्रस्ताव रख दिया। गगन सिंह ने फुसफुसाते हुए कहा, “ऋतू, देखो… आज मैं अपने इस बड़े से घर में बिल्कुल अकेला हूँ और तुम भी मेरे सामने अकेली हो। हमारे आसपास कोई देखने वाला नहीं है। अगर तुम मेरे साथ थोड़ा सा समय गुज़ार लो और मेरी /शौ/क/ और /शा/री/रि/क/ इच्छा पूरी कर दो, तो मैं तुम्हें अभी के अभी बिना किसी कर्ज के ₹२ लाख रुपये दे दूँगा।”

ससुर के मुँह से ऐसे नीच और /अ/म/र्या/दि/त/ शब्द सुनते ही ऋतू देवी के पैरों तले से जमीन खिसक गई। उसका खून खौल उठा। एक ससुर द्वारा अपनी बहू के सामने ऐसा /अ/वै/ध/ प्रस्ताव रखना उसकी कल्पना से परे था।

ऋतू गुस्से से कांपने लगी और भड़कते हुए चिल्लाई, “छी! आपको शर्म नहीं आती ऐसा घिनौना प्रस्ताव रखते हुए? आप मेरे ससुर हैं, पिता समान हैं! मैं ऐसी नीच औरत नहीं हूँ जो पैसों के लिए अपनी इज्जत बेच दे!”

गगन सिंह का मुँह उतर गया, लेकिन उसका अहंकार आहत हो चुका था। जब ऋतू ने साफ-साफ मना कर दिया, तो गगन सिंह को भी बहुत गुस्सा आ गया। गगन सिंह ने ऋतू की तरफ उंगली उठाते हुए जहरीले स्वर में धमकी दी, “ठीक है, आज तुम मना कर रही हो ना? लेकिन याद रखना ऋतू, एक दिन ऐसा भी आएगा जब तुम खुद अपनी मर्जी से मेरे घर का दरवाजा खटखटाओगी और मुझे अपने /बि/स्त/र/ तक खुद अपनी मर्जी से लेकर जाओगी!”

गगन सिंह की यह खौफनाक और अहंकरी धमकी सुनकर ऋतू देवी एक पल भी वहाँ नहीं रुकी। वह तुरंत गगन सिंह के घर से बाहर निकल आई और खाली हाथ तेजी से अपने किराये के कमरे की ओर लौट गई।

घर पहुँचकर ऋतू ने अपने पति किशन को केवल इतना ही बताया कि उसके पिता गगन सिंह ने ₹२ लाख रुपये देने से साफ मना कर दिया है। उसने ससुर की उस घिनौनी और /अ/नै/ति/क/ शर्त का जिक्र किशन से नहीं किया, क्योंकि वह जानती थी कि अगर किशन को यह बात पता चली तो बाप-बेटे में खून-खराबा हो जाएगा।

ऋतू ने किशन को दिलासा देते हुए कहा, “आप चिंता मत कीजिए। अगर आपके पिताजी ने पैसे नहीं दिए, तो कोई बात नहीं। मैं किसी न किसी तरह पैसों का इंतजाम कर लूँगी।”

अध्याय ४: १० दिसंबर २०२५ — साहूकार का दरवाजा और डगमगाता जमीर

रात के करीब ८:३० बजे का समय हो चुका था। किशन सिंह कारखाने में अपनी रात की पाली (नाइट शिफ्ट) की मेहनत-मजदूरी करने के लिए निकल गया।

किशन के जाने के बाद ऋतू देवी अकेले कमरे में बैठकर सोचने लगी। गरीबी का राक्षस उनके सिर पर मँडरा रहा था। ससुर गगन सिंह ने मदद करने के बजाय इज्जत का सौदा करने की कोशिश की थी। तभी ऋतू के दिमाग में गाँव के एक साहूकार का ख्याल आया।

अहेरा गाँव के बीचों-बीच रहने वाला साहूकार ऋषिपाल गाँव का एक धनवान व्यक्ति था, जो ऊंचे ब्याज दरों पर लोगों को पैसे उधार दिया करता था। लेकिन ऋषिपाल साहूकार के बारे में भी गाँव में तरह-तरह की बातें मशहूर थीं। वह भी स्वभाव से बेहद रसिक, कामुक और चरित्र का ढीला व्यक्ति माना जाता था।

ऋतू देवी के मन में आया कि क्यों न इस वक्त साहूकार ऋषिपाल के घर जाकर पैसों की बात की जाए, शायद वह ब्याज पर ₹२ लाख रुपये दे दे।

तारीख थी १० दिसंबर २०२५। रात के करीब ९:३० बजे का वक्त हो चुका था। पूरे अहेरा गाँव में घना अंधेरा और सन्नाटा छाया हुआ था। ऋतू देवी अपने घर से दबे पाँव बाहर निकली और गली के सन्नाटे को चीरती हुई साहूकार ऋषिपाल के घर के दरवाजे पर पहुँच गई।

ऋतू ने कांपते हाथों से ऋषिपाल के दरवाजे पर दस्तक दी।

कुछ ही देर में दरवाजा खुला और साहूकार ऋषिपाल बाहर आया। जैसे ही ऋषिपाल की नजरें अपने दरवाजे पर खड़ी ऋतू देवी पर पड़ीं, उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। ऋतू देवी रात के सन्नाटे में बेहद खूबसूरत लग रही थी। उसकी सुंदरता को देखकर ऋषिपाल का मन भी तुरंत डगमगा गया। उसके अंदर की हवस भी हिलोरे मारने लगी।

ऋषिपाल ने अपनी मूंछों पर ताव देते हुए मुस्कुराकर पूछा, “अरे! गगन सिंह की बहू ऋतू? इतनी देर रात गए तुम अकेले मेरे घर के दरवाजे पर क्या कर रही हो?”

ऋतू देवी ने संकोच करते हुए कहा, “साहूकार जी, मुझे ₹२ लाख रुपयों की बहुत सख्त जरूरत है। हमारे घर में बहुत गरीबी है और मैं दो भैंसें खरीदकर छोटा सा व्यापार करना चाहती हूँ। आप तो ब्याज पर पैसे देते हैं, कृपया मुझे ₹२ लाख रुपये कर्ज दे दीजिए।”

ऋषिपाल साहूकार ने एक चालाक मुस्कान के साथ कहा, “तुम्हारे ससुर गगन सिंह के पास तो अकूत पैसा है। तुमने अपने ससुर से पैसे क्यों नहीं माँगे?”

ऋतू ने नजरे झुकाकर कहा, “मैं उनसे पैसे उधार नहीं लेना चाहती। आप ब्याज का काम करते हैं, इसीलिए मैं आपके पास आई हूँ। मैं आपका जो भी ब्याज होगा, समय पर चुका दूँगी।”

ऋषिपाल के शातिर दिमाग में तुरंत पाप जाग उठा। उसने ऋतू को अंदर आने का इशारा किया और कहा, “अंदर आ जाओ, बाहर खड़े होकर इतनी बड़ी रकम की बात करना ठीक नहीं है।”

ऋतू देवी जैसे ही घर के अंदर दाखिल हुई, ऋषिपाल साहूकार ने मुड़कर मुख्य दरवाजा अंदर से बंद कर लिया और साँकल चढ़ा दी।

दरवाजा बंद होने की भारी आवाज सुनकर ऋतू देवी चौंक गई और घबराकर पीछे हटी। ऋषिपाल ने उसकी घबराहट ताड़ ली और कुटिलता से हँसते हुए कहा, “घबराने की कोई बात नहीं है ऋतू। मैं तुम्हें ₹२ लाख रुपये ब्याज पर देने के लिए तैयार हूँ। लेकिन… तुम्हें भी इसकी एक कीमत चुकानी पड़ेगी।”

ऋतू देवी जब साहूकार ऋषिपाल के मुँह से भी वही ‘कीमत’ शब्द सुना, तो उसके पाँव तले की जमीन खिसक गई। उसके मन में अचानक ख्याल आया कि इस गाँव के सारे मर्द एक जैसे ही हैं! मेरा ससुर गगन सिंह भी मेरे सामने यही शर्त रखता है और यह साहूकार भी मेरे सामने वही नीच शर्त रख रहा है!

लेकिन इस वक्त ऋतू देवी का जमीर और स्वाभिमान गरीबी के भयानक दबाव में डगमगा चुका था। उसके सिर पर ₹२ लाख रुपये हासिल करने का भूत सवार था ताकि वह अपनी गरीबी दूर कर सके। पैसे हासिल करने के लिए वह अब किसी भी हद तक जाने को तैयार हो चुकी थी।

ऋतू ने अपनी नजरें नीची कीं और बुझे हुए स्वर में कहा, “ठीक है… लेकिन पहले मुझे ₹२ लाख रुपये नकद दे दो। उसके बाद जो तुम्हारी इच्छा है, वह पूरी हो सकती है।”

साहूकार ऋषिपाल भी चरित्र का बेहद ढीला और कामुक इंसान था। उसने तुरंत कहा, “मैं तुम्हें अभी के अभी ₹२ लाख रुपये देता हूँ। लेकिन शर्त यह है कि आज की पूरी रात तुम्हें मेरे साथ इस कमरे में गुजारनी पड़ेगी।”

ऋतू देवी ने बेबसी और लालच के मिले-जुले अहसास में अपना सिर हिलाकर ऋषिपाल की शर्त स्वीकार कर ली।

अध्याय ५: /अ/वै/ध/ समझौते का अंधेरा और दो भैंसों का व्यापार

ऋषिपाल साहूकार की बांछें खिल गईं। वह तुरंत अपने अंदर के कमरे में गया, अपनी लोहे की तिजोरी खोली और उसमें से ५००-५०० रुपये की नोटों की गड्डियाँ निकालकर ₹२ लाख रुपये नकद गिन लिए।

बाहर आकर ऋषिपाल ने वह नोटों की गड्डी ऋतू देवी की हथेली पर रख दी और कामुक नजरों से देखते हुए कहा, “लो, यह लो तुम्हारे ₹२ लाख रुपये। घर का मुख्य दरवाजा तो मैंने पहले ही बंद कर रखा है, अब चुपचाप मेरे कमरे में चलो।”

ऋतू देवी ने नोटों की गड्डी को कसकर अपनी मुट्ठी में भींचा। उसके कदम भारी थे, लेकिन पैसों की भूख और मजबूरी ने उसके विवेक को मार दिया था। वह चुपचाप ऋषिपाल साहूकार के पीछे-पीछे उसके बेडरूम में चली गई।

कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर दिया गया।

इसके बाद उस बंद कमरे की चार दीवारों के भीतर ऋषिपाल साहूकार और ऋतू देवी के बीच आपसी रजामंदी से /अ/नै/ति/क/ और /अ/वै/ध/ सं/बं/ध/ कायम हुए। ऋषिपाल और ऋतू दोनों अपनी मर्जी से इस /अ/म/र्या/दि/त/ कृत्य में लिप्त रहे। यह घटिया सिलसिला तब तक चलता रहा जब तक कि दोनों का मन नहीं भर गया और ऋषिपाल की कामुक इच्छाएँ पूरी तरह शांत नहीं हो गईं।

जब भोर होने को आई और दोनों की इच्छाएँ पूरी हो गईं, तो साहूकार ऋषिपाल ने खुश होकर ऋतू से कहा, “देखो ऋतू, मैंने तुम्हें ₹२ लाख रुपये दिए हैं। लेकिन आज के बाद तुम्हें इनका कोई ब्याज देने की जरूरत नहीं है। क्योंकि इन रुपयों का ब्याज मैं तुमसे इसी तरह समय-समय पर वसूल करता रहूँगा।”

ऋतू देवी अब पूरी तरह से पाप के गलत रास्ते पर कदम बढ़ा चुकी थी। घर से बाहर निकलते समय उसके मन में एक अजीब और विकृत विचार आया। ऋतू ने मन ही मन सोचा, ‘जब मैंने अपनी इज्जत का सौदा करके इस साहूकार के साथ रात गुजार ही ली है, तो फिर अपने मतलब और पैसों के लिए दूसरे लोगों के साथ वक्त गुजारने में अब क्या परहेज करना?’

१० दिसंबर की वह काली रात ऋतू देवी के नैतिक पतन की शुरुआत साबित हुई।

ऋतू उन ₹२ लाख रुपयों को अपने आंचल में छुपाकर तड़के ही अपने किराये के कमरे पर पहुँच गई। सुबह के करीब ६:०० बजे जब उसका पति किशन सिंह कारखाने की नाइट शिफ्ट खत्म करके थका-हारा घर लौटा, तो ऋतू ने बहुत ही प्रसन्नता का नाटक करते हुए नोटों की गड्डी किशन के सामने रख दी।

ऋतू ने झूठ बोलते हुए कहा, “देखिए जी! मैंने ₹२ लाख रुपयों का इंतजाम कर लिया है। हमारे गाँव के साहूकार ऋषिपाल जी बहुत भले आदमी हैं। मैंने उनसे बात की और उन्होंने हमें ₹२ लाख रुपये कर्ज के रूप में दे दिए हैं। हम धीरे-धीरे मेहनत करके उनका सारा कर्ज उतार देंगे।”

किशन सिंह की खुशी का कोई ठिकाना न रहा। उसे अपनी पत्नी पर बहुत गर्व हुआ कि उसने उनकी गरीबी दूर करने के लिए इतना बड़ा इंतजाम कर लिया।

अगले ही दिन, किशन सिंह खुशी-खुशी पास के पशु मेले में गया और ₹२ लाख रुपये में दो बहुत ही अच्छी और अधिक दूध देने वाली भैंसें खरीद लाया।

भैंसों के आते ही ऋतू देवी का काम शुरू हो गया। वह हर रोज सुबह-शाम भैंसों का चारा काटने के लिए गाँव के खेतों में जाने लगी, उनका दूध निकालती और गाँव की दूध डेयरी में बेचने लगी। धीरे-धीरे दूध के इस छोटे से व्यापार से घर में रोज नकद पैसे आने लगे। दूसरी तरफ किशन सिंह भी कारखाने में मेहनत-मजदूरी करके पैसे कमा रहा था। दोनों की मेहनत से घर की आर्थिक स्थिति तेजी से सुधरने लगी और घर में खुशहाली महसूस होने लगी।

अध्याय ६: शराब की लत, क्लेश और ३० दिसंबर २०२५ की काली रात

लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। जैसे ही घर में पैसों की आवक बढ़ी और आर्थिक तंगी दूर हुई, किशन सिंह का दिमाग भटकने लगा।

काम के तनाव और गलत संगति के कारण किशन सिंह ने धीरे-धीरे शाम को अपने दोस्तों के साथ शराब पीना शुरू कर दिया। शुरुआत में तो वह कभी-कभार थोड़ी शराब पीता था, लेकिन देखते ही देखते उसे शराब की भयंकर लत लग गई। किशन सिंह एक पक्का शराबी बन गया।

अब किशन सिंह रोज कारखाने से मिलने वाली मजदूरी का बड़ा हिस्सा अपने शराबी दोस्तों के साथ पार्टी करने में उड़ाने लगा। हर रोज रात को वह शराब के नशे में धुत होकर घर लौटता और बिना किसी वजह के अपनी पत्नी ऋतू देवी के साथ गाली-गलौच और मारपीट करता। जिस घर में अभी-अभी खुशहाली आई थी, वहाँ अब रोज-रोज का क्लेश, झगड़े और चीख-पुकार का माहौल बन गया।

ऋतू देवी अपने पति के इस बदले हुए रूप से बेहद परेशान और दुखी रहने लगी। वह मन ही मन सोचती कि उसने जिस पति के लिए अपना जमीर तक बेच दिया, वह पति अब शराबी बनकर घर को तबाही की ओर ले जा रहा है।

शराब की इस भयंकर लत के कारण किशन सिंह ने कारखाने जाना भी बंद कर दिया। वह दिनभर नशे में पड़ा रहता। इसी बीच नियति का एक और मार पड़ा—ऋतू की दोनों भैंसें अचानक किसी अज्ञात बीमारी की चपेट में आ गईं और दूध देना बंद कर दिया।

व्यापार पूरी तरह ठप हो गया। घर में पैसों की आवक फिर से शून्य हो गई। एक बार फिर से किशन और ऋतू के घर में भयानक गरीबी और कंगाली का आलम छा गया।

अब ऋतू देवी के मन में दो बड़े और भयानक कांड रचने की योजना पकने लगी, जिसके बारे में गाँव के किसी भी व्यक्ति को कोई खबर नहीं थी। ऋतू अपनी गरीबी को दूर करने और साहूकार ऋषिपाल के ₹२ लाख के कर्ज के नाम पर बनने वाले दबाव से छूटने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार थी।

तारीख आ गई ३० दिसंबर २०२५

शाम के करीब ५:०० बजे का वक्त था। किशन सिंह घर में रखे थोड़े-बहुत पैसे लेकर अपने शराबी दोस्तों के साथ शराब पीने के लिए बाहर चला गया।

कमरे में अकेली बैठी ऋतू देवी घंटों तक सोचती रही। उसके मन में ख्याल आया कि उसका ससुर गगन सिंह गाँव का एक बहुत अमीर आदमी है। भले ही ससुर ने पहले उसके सामने /अ/नै/ति/क/ शर्त रखी थी, लेकिन अगर वह अपने ससुर गगन सिंह की शारीरिक इच्छाएँ पूरी कर दे, तो उसका ससुर ही उसकी कंगाली दूर कर सकता है और उसके सारे कर्जे भी खत्म कर सकता है।

सोचते-सोचते रात के ९:०० बज गए, लेकिन शराबी पति किशन सिंह घर वापस नहीं आया।

रात के करीब १०:०० बजे, ऋतू देवी अपने कमरे का ताला लगाकर बाहर निकली। रात के सन्नाटे में वह सीधे अपने ससुर गगन सिंह के पक्के मकान के दरवाजे पर जा पहुँची। ऋतू ने दरवाजे पर जोर-जोर से दस्तक दी।

अंदर सो रहे गगन सिंह ने जब दरवाजे पर खटखट की आवाज सुनी, तो वह उठकर आया और दरवाजा खोला। सामने अपनी बेहद सुंदर बहू ऋतू देवी को रात के १०:०० बजे अकेली खड़ी देखकर गगन सिंह के चेहरे पर एक शैतानी और कुटिल मुस्कान छा गई।

गगन सिंह ने अपनी हवस भरी नजरों से ऋतू को घूरते हुए मन ही मन सोचा, ‘मेरी दी हुई धमकी काम कर गई! यह औरत आखिरकार आज खुद मेरे दरवाजे पर चल कर आई है।’

अध्याय ७: ससुर से /सं/बं/ध/ और साहूकार का नया चक्रव्यूह

ऋतू देवी ने नज़रे उठाकर ससुर से पूछा, “पिताजी… क्या मैं घर के अंदर आ सकती हूँ?”

गगन सिंह ने दरवाजे से हटते हुए हँसकर कहा, “अरे ऋतू! यह घर तो तुम्हारा ही है, अंदर आओ ना।”

ऋतू जैसे ही घर के अंदर दाखिल हुई, गगन सिंह ने तुरंत मुख्य दरवाजा अंदर से बंद कर लिया।

गगन सिंह ने उत्सुकता से पूछा, “इतनी देर रात गए तुम अपने ससुर के घर क्या करने आई हो ऋतू?”

ऋतू देवी ने अपनी आँखों में नकली आँसू लाते हुए अपना दुखड़ा रोना शुरू किया, “पिताजी, मैं बहुत मुसीबत में हूँ। आपका बेटा किशन तो पूरी तरह शराबी बन चुका है। वह न तो कोई काम करता है और न घर में पैसे देता है। दूसरी तरफ, जिस साहूकार ऋषिपाल से मैंने ₹२ लाख रुपये कर्ज लिए थे, वह अब अपने पैसे वापस माँग रहा है। मेरे पास एक रुपया भी नहीं है। आप मुझे ₹२ लाख रुपये दे दीजिए।”

गगन सिंह ने वही पुराना /अ/म/र्या/दि/त/ सवाल दोहराया, “मैं तुम्हें ₹२ लाख रुपये जरूर दे सकता हूँ ऋतू, लेकिन क्या तुम मेरी शर्त मानने के लिए तैयार हो? मेरी शारीरिक इच्छाएँ पूरी करनी होंगी।”

लेकिन इस बार ऋतू का जवाब पूरी तरह बदल चुका था। उसने बिना किसी हिचकिचाहट के तुरंत कहा, “मुझे आपकी सारी शर्तें मंजूर हैं पिताजी! बस आप मुझे अभी ₹२ लाख रुपये दे दीजिए।”

गगन सिंह का जमीर और उसकी आत्मा तो पहले ही मर चुकी थी। उसने तुरंत अपनी तिजोरी खोली और ₹२ लाख नकद निकालकर अपनी बहू ऋतू देवी के हाथ में थमा दिए।

इसके बाद गगन सिंह अपनी ही बहू ऋतू का हाथ पकड़कर उसे अपने बेडरूम में ले गया।

कमरे का दरवाजा बंद होने के बाद, ससुर गगन सिंह और बहू ऋतू देवी के बीच आपसी सहमति से /अ/नै/ति/क/ और /अ/वै/ध/ सं/बं/ध/ कायम हुए। दोनों ने मिलकर इस /गं/दे/ का/म/ को तब तक अंजाम दिया जब तक कि दोनों का मन नहीं भर गया।

जब सब खत्म हो गया, तो गगन सिंह ने खुश होकर अपनी बहू से कहा, “ऋतू, आज के बाद तुम्हें पैसों के लिए किसी के आगे हाथ फैलाने की जरूरत नहीं है। तुम्हारी आर्थिक और शारीरिक दोनों तरह की जरूरतें मैं पूरी करूँगा।”

ऋतू देवी ससुर से ₹२ लाख रुपये लेकर रात के अंधेरे में ही अपने किराये के कमरे पर लौट आई। लेकिन घर पहुँचकर ऋतू के दिमाग में एक नया ही लालच आ गया। उसने सोचा, ‘मुझे ससुर से ₹२ लाख रुपये मिल तो गए हैं, लेकिन मैं यह पैसे साहूकार ऋषिपाल को वापस नहीं दूँगी, बल्कि इन्हें अपने पास रखूँगी।’

दिन बीतते गए और तारीख आ गई ५ जनवरी २०२६

सुबह के करीब १०:०० बजे, साहूकार ऋषिपाल ने ऋतू देवी के मोबाइल पर फोन कॉल किया। ऋषिपाल ने कड़क आवाज में कहा, “ऋतू! जो ₹२ लाख रुपये तुमने कर्ज लिए थे, अब बहुत दिन हो गए हैं। मुझे मेरे ₹२ लाख रुपये आज के आज ही वापस चाहिए!”

ऋतू देवी ने बेहद लच्छेदार और कामुक स्वर में कहा, “साहूकार जी, इतनी जल्दी भी क्या है? आपके पैसे लौटाने के बहाने ही सही, आज रात मैं आपके घर आने वाली हूँ…”

ऋषिपाल साहूकार तुरंत ऋतू का इशारा समझ गया और मुस्कुराकर बोला, “ठीक है, फिर तो मैं आज रात तक का इंतजार कर सकता हूँ।”

रात के करीब ९:३० बजे, ऋतू का पति किशन सिंह हमेशा की तरह शराब के नशे में धुत होकर बिस्तर पर बेसुध सो रहा था। ऋतू चुपचाप कमरे से बाहर निकली और साहूकार ऋषिपाल के घर पहुँच गई।

दरवाजा खुलते ही ऋतू अंदर आई और ऋषिपाल से बोली, “साहूकार जी, मैं आपके ₹२ लाख रुपये नकद तो नहीं लौटा सकती। लेकिन बदले में, मैं जिंदगी भर आपकी हर शारीरिक इच्छा पूरी करती रहूँगी।”

साहूकार ऋषिपाल भी इसी मौके की ताक में था। उसने तुरंत दरवाजा बंद किया और ऋतू को लेकर अपने कमरे में चला गया। उस रात भी दोनों के बीच आपसी सहमति से /अ/नै/ति/क/ सं/बं/ध/ बने।

अब ऋतू देवी का यह रोज का नियम बन गया। जब भी उसका मन करता या पैसों की जरूरत होती, वह साहूकार ऋषिपाल के घर भी जाती और अपने ससुर गगन सिंह के घर भी जाती। दोनों पुरुषों से पैसे भी ऐंठती और उनके साथ अपना समय भी व्यतीत करती।

अध्याय ८: ५ जनवरी २०२६ — दोहरा चरित्र और गाँव के गलियारों की चर्चा

कहते हैं कि पाप का घड़ा चाहे कितना भी छुपाकर रखा जाए, एक न एक दिन वह छलक ही जाता है। अहेरा गाँव छोटा सा गाँव था। रात के सन्नाटे में ऋतू देवी का कभी ससुर गगन सिंह के घर जाना तो कभी साहूकार ऋषिपाल के घर जाना गाँव के कुछ सतर्क लोगों की नजरों में आने लगा था।

गाँव के गलियारों, चौपालों और पनघट पर दबी जुबान में चर्चाएँ शुरू हो गईं कि किशन सिंह की पत्नी ऋतू देवी अपने ससुर गगन सिंह के साथ भी /अ/वै/ध/ सं/बं/ध/ में है और साहूकार ऋषिपाल के साथ भी उसका /अ/नै/ति/क/ चक्कर चल रहा है।

अहेरा गाँव का ही एक युवक दीपक कुमार, जो किशन सिंह का बचपन का पुराना दोस्त था, उसने जब ये भयानक चर्चाएँ सुनीं, तो उसका दिल दहल गया।

एक दिन दीपक कुमार ने किशन सिंह को अकेले में पकड़ा और गंभीर लहजे में कहा, “किशन भाई! तू दिन-रात शराब के नशे में धुत रहता है और तुझे खबर ही नहीं है। तेरी पत्नी ऋतू गलत रास्ते पर चल पड़ी है। उसके तेरे पिता गगन सिंह और साहूकार ऋषिपाल के साथ गलत संबंध चल रहे हैं।”

शुरुआत में तो शराबी किशन सिंह ने अपने दोस्त की बात पर विश्वास नहीं किया और गुस्से में चिल्लाया, “दीपक! तू होश में तो है? मेरी पत्नी के बारे में ऐसी बकवास बात मत कर! वह बहुत सीधी है।”

लेकिन दीपक ने कसम खाते हुए कहा, “किशन, मैं तेरा दोस्त हूँ, इसीलिए तुझे सचेत कर रहा हूँ। अपनी पत्नी पर नजर रख, वरना तू कहीं का नहीं रहेगा।”

दीपक की इन बातों ने किशन सिंह के सोए हुए जमीर को झकझोर दिया। उसके दिमाग में शक का कीड़ा रेंगने लगा। उसे लगने लगा कि शायद शराब के नशे में रहने के कारण वह अपनी पत्नी को समय नहीं दे पाता, इसीलिए शायद ऋतू भटक गई हो। किशन सिंह ने अब चुपके से अपनी पत्नी ऋतू की गतिविधियों पर नजर रखना शुरू कर दिया।

अध्याय ९: १५ जनवरी २०२६ — ईख के खेत में /क/त्ल/ और साजिश

दिन बीतते गए और तारीख आ गई १५ जनवरी २०२६। कड़ाके की ठंड और सुबह का घना कोहरा अहेरा गाँव को ढके हुए था।

सुबह के करीब १०:०० बजे का वक्त था। किशन सिंह ने नाटक किया कि वह अपने शराबी दोस्तों के साथ बाहर जा रहा है, लेकिन वह गाँव में ही छुपकर अपनी पत्नी पर नजर रखने लगा।

जैसे ही किशन घर से निकला, ऋतू देवी दबे पाँव बाहर आई और सीधे अपने ससुर गगन सिंह के घर पहुँच गई। ऋतू ने गगन सिंह से कहा, “सुनिए, आज मैं आपके घर में वक्त नहीं बिता सकती। आज मैं आपके गन्ने (ईख) के खेत में चारा काटने जा रही हूँ। आप भी १० मिनट बाद अपनी मोटरसाइकिल से खेत में आ जाना, वहीं एकांत में समय बिताएंगे।”

गगन सिंह मुस्कुराया और बोला, “तुम खेत पहुँचो, मैं अभी आता हूँ।”

ऋतू देवी अपने घर लौटी, चारा काटने वाली लोहे की तेज धारदार दराती उठाई और ससुर गगन सिंह के गन्ने के खेत की ओर चल दी। १० मिनट बाद गगन सिंह भी अपनी मोटरसाइकिल स्टार्ट करके खेत में पहुँच गया।

घने गन्ने के खेत के बीचों-बीच दोनों एकत्र हुए। वहाँ ससुर गगन सिंह और बहू ऋतू देवी के बीच फिर से /अ/नै/ति/क/ और /अ/वै/ध/ सं/बं/ध/ कायम हुए।

लेकिन गगन सिंह के मन में एक दूसरी ही रंजिश पक रही थी। गगन सिंह को पता चल चुका था कि उसकी बहू ऋतू साहूकार ऋषिपाल के साथ भी सोती है। गगन सिंह साहूकार ऋषिपाल को अपने रास्ते से हटाना चाहता था।

इसीलिए, /अ/नै/ति/क/ काम खत्म होने के बाद, गगन सिंह ने अपने जेब से मोबाइल निकाला और साहूकार ऋषिपाल को फोन लगाया। गगन सिंह ने ऋषिपाल से कहा, “ऋषिपाल भाई! आज मैं अपने खेत में बैठकर शराब की पार्टी कर रहा हूँ। यहाँ एक बहुत ही सुंदर और रसिक महिला भी आई हुई है। तुम भी आ जाओ, साथ मिलकर मज़ा लेंगे।”

चरित्र का ढीला साहूकार ऋषिपाल तुरंत लालच में आ गया। उसने अपनी मोटरसाइकिल उठाई और कुछ ही देर में गगन सिंह के खेत में पहुँच गया।

खेत में गगन सिंह और ऋषिपाल दोनों बैठकर शराब पीने लगे। जब शराब का नशा ऋषिपाल के सिर चढ़ गया, तो उसने उत्सुकता से पूछा, “गगन भाई, वह सुंदर महिला कहाँ है?”

तभी गगन सिंह ने आवाज लगाई। गगन सिंह की आवाज सुनते ही गन्ने के झुरमुट से ऋतू देवी बाहर आई, जिसके हाथ में चारा काटने वाली लोहे की तेज धारदार दराती थी।

ऋषिपाल अभी ऋतू को देखकर हैरान ही हो रहा था कि गगन सिंह ने लपककर ऋतू के हाथ से वह तेज धारदार दराती छीन ली और बिना एक पल भी गँवाए, पूरी ताकत से दराती साहूकार ऋषिपाल की गर्दन पर चला दी!

“छपाक!”

एक ही वार में साहूकार ऋषिपाल की गर्दन कट गई और खून का फव्वारा छूट पड़ा! ऋषिपाल तड़पकर मौके पर ही ढेर हो गया। उसका /क/त्ल/ कर दिया गया था।

/ह/त्या/ करने के बाद, गगन सिंह और ऋतू देवी दोनों मिलकर खेत की मिट्टी में फावड़े से एक बड़ा गड्ढा खोदने लगे ताकि ऋषिपाल की लाश को गाड़कर सबूत मिटाया जा सके।

अध्याय १०: पति का /खो/फ/नाक/ प्रतिशोध, दोहरे /ह/त्या/कांड/ और आत्मसमर्पण

लेकिन नियति का अंतिम और सबसे खौफनाक अध्याय अभी लिखा जाना बाकी था।

दूसरी तरफ, गाँव में घूम रहे किशन सिंह को उसके दोस्त दीपक कुमार ने फिर देखा और दौड़कर उसके पास आया। दीपक ने हाँफते हुए कहा, “किशन! तेरी पत्नी ऋतू अभी-अभी तेरे पिता गगन सिंह के गन्ने के खेत में गई है और तेरे पिता भी वहीं गए हैं!”

किशन सिंह का खून खौल उठा। शक की आग में जलता हुआ किशन सिंह दौड़ता हुआ अपने पिता गगन सिंह के गन्ने के खेत में पहुँच गया।

घने गन्ने के खेत के अंदर जब किशन सिंह ने झाँका, तो वहाँ का नज़ारा देखकर उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं!

सामने ज़मीन पर साहूकार ऋषिपाल की खून से लथपथ लाश पड़ी थी, और उसका पिता गगन सिंह अपनी बहू ऋतू देवी के साथ मिलकर लाश को दफनाने के लिए मिट्टी खोद रहा था!

अपनी पत्नी और अपने पिता को इस हाल में देखकर किशन सिंह का दिमाग पूरी तरह सनक गया। उसे समझ आ गया कि उसके पिता और उसकी पत्नी के बीच भयानक /अ/वै/ध/ सं/बं/ध/ हैं और वे मिलकर कत्ल भी कर रहे हैं।

प्रतिशोध और गुस्से की ज्वाला में अंधा होकर किशन सिंह खेत में कूदा। उसने ज़मीन पर पड़ी लोहे की भारी कसी (फावड़ा) उठाई और चीखते हुए अपने पिता गगन सिंह पर हमला कर दिया!

किशन ने कसी का धारदार वार सीधे अपने ससुर/पिता गगन सिंह की गर्दन पर जड़ दिया! गगन सिंह का सिर कटकर ज़मीन पर गिर पड़ा। अपने ही पिता का /क/त्ल/ करने के बाद, किशन सिंह का हैवानी रूप बाहर आ गया।

अपनी आँखों के सामने ससुर और प्रेमी की हत्या होते देखकर ऋतू देवी खौफ के मारे चीखती हुई खेत से भागने लगी। लेकिन किशन सिंह अब रुकने वाला नहीं था। उसने दौड़कर भागती हुई ऋतू को बालों से पकड़ा और ज़मीन पर पटक दिया।

किशन ने उसी खून से सनी कसी से अपनी पत्नी ऋतू देवी पर अंधाधुंध वार करने शुरू कर दिए। उसने कसी से काटकर अपनी ही पत्नी के शरीर के /टु/क/ड़े-टु/क/ड़े/ कर डाले!

कुछ ही मिनटों के भीतर गन्ने का वह खेत तीन-तीन लाशों और खून के पोखरे में तब्दील हो चुका था।

जब किशन सिंह का गुस्सा शांत हुआ, तो उसने कसी ज़मीन पर फेंक दी। उसका पूरा शरीर और कपड़े खून से सने हुए थे। उसने अपने हाथ पोंछे और सीधे पैदल चलते हुए पास के पुलिस स्टेशन पहुँच गया।

थाने में ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी खून से सने किशन सिंह को देखकर दहल गए। किशन सिंह ने पुलिस के सामने अपने हाथ आगे कर दिए और शांत स्वर में कहा, “साहब! मुझे गिरफ्तार कर लीजिए। मैंने अपने पिता गगन सिंह और अपनी पत्नी ऋतू देवी के /टु/क/ड़े-टु/क/ड़े/ करके कत्ल कर दिया है। और मेरे पिता ने साहूकार ऋषिपाल की /ह/त्या/ की थी। तीनों की लाशें खेत में पड़ी हैं।”

पुलिस तुरंत हरकत में आई। पुलिस की टीम किशन सिंह को साथ लेकर गन्ने के खेत में पहुँची। वहाँ का खौफनाक नजारा देखकर पुलिसवालों की रूह काँप गई। पुलिस ने मौके से गगन सिंह, ऋतू देवी और साहूकार ऋषिपाल तीनों के शव बरामद किए और पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भेज दिया।

उपसंहार: न्याय की चौखट और नैतिक सीख

किशन सिंह को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया। पुलिस ने हत्या, साक्ष्य मिटाने और आपराधिक षड्यंत्र की गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज कर लिया।

अहेरा गाँव का वह शांत माहौल इस त्रिस्तरीय हत्या कांड से दहल उठा। एक हंसता-खेलता परिवार, जिसके पास ज़मीन, पैसा और सब कुछ था, केवल अनैतिक आचरण, हवस, लालच और शराब की लत के कारण पूरी तरह तबाह हो गया।

इस घटना से समाज को मिलने वाली सीख: १. अनैतिकता का अंत विनाश है: गगन सिंह और ऋषिपाल साहूकार का /अ/नै/ति/क/ आचरण उनके अपने ही अंत का कारण बना। २. शराब और व्यसन की तबाही: किशन सिंह की शराब की लत ने उसे अपने ही परिवार से दूर किया और अंततः उसे एक खौफनाक कातिल बना दिया। ३. चरित्र ही असली धन है: ऋतू देवी ने गरीबी से निकलने के लिए अपने चरित्र और मर्यादा का सौदा किया, जिसकी कीमत उसे अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।

आज किशन सिंह जेल की सलाखों के पीछे अपनी सजा का इंतजार कर रहा है, जबकि अहेरा गाँव का वह गन्ने का खेत आज भी उस खौफनाक रात और इंसानी पतन की गवाही दे रहा है।

सचेतक संदेश: अनैतिकता, लालच और नशा केवल तबाही के रास्ते खोलते हैं। हमेशा नैतिक मूल्यों और कानून का पालन करें।

Disclaimer: This story is fictional and created for entertainment purposes only. Any names, characters, places, or events are fictitious or used fictitiously. No real person or organization is intended to be portrayed.

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